Monday, September 20, 2021

महिलाओं के लिए मातम से कम नहीं अजन्मे बच्चे को खोना

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

मैं अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए बहुत उत्साहित थी। शादी के पांच साल बाद ये मेरी पहली प्रेग्नेंसी थी। बच्चे का नाम भी सोच लिया था। घर पर अकेले बैठे घंटों उससे बातें करती। एक दिन अचानक शरीर के निचले हिस्से में दर्द होने लगा। मुझे महसूस हुआ कि ब्लीडिंग की वजह से मैं पूरी तरह भीग गई हूं। पति के साथ अस्पताल गई। वहां पहुंचकर पता चला कि जिस बच्चे के जन्म के सपने देख रही थी, वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। ये किस्सा है दिल्ली की रेखा की जिंदगी का। उनकी आवाज में अपने अजन्मे बच्चे को खोने का दर्द साफ झलकता है। ये दर्द सिर्फ एक महिला का नहीं है बल्कि 31 शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम के सर्वे की मानें तो दुनिया भर में हर साल करीब 23 मिलियन मिसकैरेज होते हैं। इनमें 50 में से एक महिला जीवन में दो बार मिसकैरेज का अनुभव करती है, जबकि एक प्रतिशत महिलाएं तीन या इससे अधिक बार। ये स्थिति मानसिक रूप से हिला देने वाली होती है। इससे न सिर्फ महिला, बल्कि उसके पार्टनर पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मिसकैरेज की सटीक वजह के बारे में तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन कुछ खास मेडिकल कंडीशन के दौरान महिला को अलर्ट रहने की जरूरत होती है।

क्या है मिसकैरेज?
जब प्रेग्‍नेंसी के 20वें सप्‍ताह से पहले ही भ्रूण नष्‍ट हो जाए तो इस स्थिति को मिसकैरेज कहा जाता है। ज्यादातर मामलों में प्रेग्‍नेंसी की पहली तिमाही में मिसकैरेज होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में कम से कम 30% प्रेग्नेंसी मिसकैरेज की वजह से खत्म हो जाती हैं। शोध पत्रिका 'लांसेट प्लानेटरी हेल्थ' के एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में बढ़ते एयर पॉल्यूशन के कारण मिसकैरेज का खतरा सात फीसद तक बढ़ जाता है, जोकि भारत और पाकिस्तान में ज्यादा है।
मिसकैरेज के लक्षण

  • ब्लीडिंग
  • स्पॉटिंग
  • पेट और कमर में दर्द
  • खून के साथ टिश्यू निकलना

बता दें, प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लीडिंग या स्पॉटिंग के बाद मिसकैरेज होना जरुरी नहीं है। लेकिन ऐसा होने के बाद सतर्क रहने की जरूरत है।

मिसकैरेज की वजह
थायरॉयड- प्रेग्नेंसी में थायरॉयड होने पर बहुत सतर्क रहने की जरूरत होती है, क्योंकि ये कई बार मिसकैरेज की वजह बन जाता है।
डायबिटीज - इस दौरान तमाम महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाती है। ऐसे में समय समय पर डॉक्टर से जांच कराना जरुरी है।
फाइब्रॉयड्स- यूटरिन फाइब्रॉयड, इम्यून डिसऑर्डर भी कई बार मिसकैरेज का कारण बन जाते हैं।
क्रोमोसोमल असामान्यता और हार्मोनल असंतुलन- भ्रूण को गलत संख्‍या में क्रोमोजोम मिलने के कारण भी मिसकैरेज के चांस बढ़ जाते हैं। वहीं, समय रहते हार्मोनल असंतुलन की स्थिति को दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है।
मिसकैरेज से रिलेशनशिप पर असर
शोध की मानें तो मिसकैरेज के बाद कपल्स के रिश्ते पर असर पड़ सकता है। ये उनके अलग होने की वजह भी बन सकता है और करीब भी ला सकता है। ये सब इस बात पर डिपेंड करता है कि वे कैसे एक-दूसरे को संभालते हैं। साइकॉलोजिस्ट डॉ. नेहा गर्ग बताती हैं कि किसी महिला को अचानक जब पता चले कि उनके गर्भ में पल रहा बच्चा दुनिया में आने से पहले ही चल बसा तो इस दुख को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल होता है। इसे लेकर कई महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण तीन साल तक दिखाई देते हैं। ऐसे में इस डिप्रेशन से बाहर निकलना बहुत जरूरी है। अगर आप और आपके पार्टनर की मिसकैरेज पर अलग-अलग सोच है, तो आप अपने रिश्ते में अकेला महसूस कर सकते हैं। यहां तक​ कि ये सोचने लग जाते हैं कि क्या आपको एक साथ होना चाहिए। ऐसे में ये जरुर याद रखें कि मिसकैरेज किसी भी महिला के साथ हो सकता है। एक दूसरे को समझना जरुरी है।

मिसकैरेज के बाद कपल्स रिश्ते को ऐसे संभालें

  • अपनी फीलिंग शेयर करें- मिसकैरेज के बाद कपल्स के अनुभवों को लेकर अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं के पार्टनर फीलिंग और अनुभवों को एक दूसरे से साझा करते हैं वे पर्सनली और फिजिकली उनके करीब महसूस करती हैं। दुख बांटने के अनुभव उन्हें ज्यादा पास ले आते हैं।
  • एक दूसरे का सहारा बनें- अगर आपको लगता है कि आपका पार्टनर पूरी तरह से ठीक है तो इसका मतलब ये न समझें कि उसे दुख नहीं है। हमेशा एक-दूसरे को सपोर्ट करें।
  • मिसकैरेज होना किसी की गलती नहीं है। एक-दूसरे पर दोष डालने से कपल्स के बीच केवल दरार पैदा होती है इसलिए दोष देने से बचें।
  • ऐसे कपल्स से बात करें, जो मिसकैरेज का दर्द झेल चुके हैं। अगर फिर भी डिप्रेशन महसूस करते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लें सकते हैं।

महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान

  • मिसकैरेज के बाद शरीर में खून की कमी हो जाती है, इसलिए आयरन और विटामिन युक्त फलों और सब्जियों का सेवन जरूरी है।
  • कम से कम दो सप्ताह तक आराम करें।
  • भोजन में दाल, दूध और पनीर जैसी प्रोटीन और कैल्शियम वाली चीजों की मात्रा बढ़ा दें।
  • प्रेग्नेंसी के बारे में पढ़ें। डॉक्टरों और पहले मां बन चुकी महिलाओं से बात करें।

मिसकैरेज के बाद कब हो दूसरी प्रेग्नेंसी
मिसकैरेज और दूसरी प्रेग्नेंसी में कम से कम तीन या चार महीने का अंतर रखने की सलाह दी जाती है। इससे पहले कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अगर कपल्स दोनों में से किसी एक को भी एल्कोहॉल या स्मोकिंग की आदत है तो इससे दूर रहें। इससे मिसकैरेज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कंसीव करने से पहले आरएच फैक्टर, ब्लड शुगर, थायरॉयड, हेपेटाइटिस की जांच करवा लें। जंक फूड से दूर रहें। प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद गायनेकोलॉजिस्ट से संपर्क करें। सभी गाइडलाइन का पालन करते हुए अपनी प्रेग्नेंसी को स्वस्थ और खुशनुमा बनाएं।
ये बॉलीवुड एक्ट्रेसेस झेल चुकी हैं मिसकैरेज का दर्द

  • शिल्पा शेट्टी​​​
  • काजोल
  • कश्मीरा शाह
  • सायरा बानो
  • गौरी खान
  • रश्मि देसाई​​​​

एक्टिव गर्ल्स की पर्सनल ब्यूटी गाइड

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

एक्टिव गर्ल्स की पर्सनल ब्यूटी गाइड

आप जिम जाती हैं? वेटलिफ्ट, स्विमिंग, रनिंग या फिर जॉगिंग जैसा वर्कआउट करती हैं? फिजिकल फिटनेस का खयाल रखती हैं?

वर्कआउट करने पर सनबर्न, टैनिंग, बेजान बाल, ऑयली, रूखी स्किन की रेडनेस या स्कैल्प में इचिंग जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। हमने बात की एक्सपर्ट्स से और जाना की एक्टिव वुमेन, आमतौर पर ऐसी किन और परेशानियों का सामना करती हैं साथ ही किस तरह इनसे आसानी से निपटा जा सकता है।

बॉडी ब्रेकआउट

पीठ, हिप्स या सीने पर होने वाले एक्ने ऐसी समस्या है जो स्किन की सही सफाई नहीं करने और औरतों में होने वाले तमाम हार्मोनल बदलाव के कारण होती है। यह एक तरह का फंगल इन्फेक्शन है जिससे बचने के लिए बॉडी को साफ़ सुथरा रखना चाहिए। नहाने से पहले सरसों के तेल की मालिश और नहाते हुए स्क्रब का इस्तेमाल, आपको इस समस्या से दूर रखेगा।

ब्रूज्ड टोनेल-

क्या आपके पैरों के अंगूठे के नाखून में इनग्रोथ है यानी नाखून स्किन के अन्दर घुस कर चुभता और दर्द करता है? यह ब्रूज्ड टोनेल या जॉगर्स टो है, जो एक आम समस्या है।

ब्यूटी एक्सपर्ट सुवर्णा त्रिपाठी बताती हैं कि इसके कारण रनिंग या जॉगिंग के दौरान जूते पहनने पर नाखून आपके पैर के आसपास की स्किन में घुस जाते हैं। आपको भी यह परेशानी है तो ध्यान रखिए कि आपके पैर के नाखून हमेशा छोटे हों। ऐसी दिक्कत आए तो आप पैडीक्योर की दो से तीन सिटिंग लेकर आसानी से इससे निजात पा सकते हैं।

ऑयली या ड्राई स्कैल्प और हेयर फॉल

फिजिकल एक्टिवीज करते हुए बालों को पोनी टेल में बाँध कर रखा जाता है। जिसके कारण स्कैल्प पर पसीना काफी देर तक रह जाता है। स्वेटिंग के कारण स्कैल्प में ड्राईनेस या इचिंग जैसी दिक्कतें आती हैं जिनसे आपके बालों को नुकसान पहुंचता है। इससे बचने के लिए आप जब भी फिजीकल एक्टिविटी करके लौटें तो गुनगुने पानी से शॉवर ज़रूर लें। नहाने से पहले बालों में की गई ऑयलिंग स्कैल्प और बालों को ड्राई नहीं होने देती। अपना शैम्पू चुनते हुए ध्यान रखें कि उसमें सल्फेट या पैराफिन जैसे कैमिकल ना हों। फिर भी अगर यह समस्या आ रही है तो आप हेयरफौल ट्रीटमेंट की पावर डोज ले सकती है जो इस समस्या का कारगर उपाय है।

एथलीट फुट

नाम से कहीं आपने इसे किसी एथलीट का फुट तो नहीं समझ लिया? दरअसल स्किन पर होने वाली रैशेज़, रेडनेस, खुजली और जलन की दिक्कतों को एथलीट फुट के नाम से जाना जाता है।

ब्यूटी एक्सपर्ट पूनम झा बताती हैं कि यह परेशानी वर्कआउट करने वाली महिलाओं में होने की सबसे बड़ी वजह है स्वेटिंग के बाद बॉडी को सलीके से साफ नहीं किया जाना आमतौर पर लोग या तो पसीना सुखा लेते हैं या पसीना पोंछ कर कपड़े बदल लेते हैं। इससे बचने का आसान तरीका है कि एक्सरसाइज़ के बाद आप गुनगुने पानी से जरूर नहाएं। बॉडी के जिन हिस्सों पर स्वेटिंग होती है उनपर पाउडर लगाएं और सोने से पहले उसे साफ जरूर करें। अगर यह दिक्कत बनी रहे तो उस जगह पर हर्बल क्रीम या प्योर नारियल का तेल लगा कर रखें ताकि उस जगह की नमी ख़त्म होने के कारण वहां खुजली न हो।

नरेंद्र गिरि के निधन पर शोक की लहर

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

लखनऊ।

प्रयागराज में भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का सोमवार यानी आज संदिग्ध हालात में निधन हो गया। महंत के निधन की खबर मिलते ही मठ पर बड़ी संख्या में भक्त और श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं। उधर, राजनीतिक दलों में भी शोक की लहर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह समेत विभिन्न राजनीतिक दलों और संत-महात्माओं ने इस दुखद घटना पर शोक संवेदनाएं व्यक्त की हैं।

PM ने कहा- श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद है। आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति समर्पित रहते हुए उन्होंने संत समाज की अनेक धाराओं को एक साथ जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। प्रभु उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें। ॐ शांति!!

आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति : योगी आदित्यनाथ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा- अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि जी का ब्रह्मलीन होना आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति है। प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और शोकाकुल अनुयायियों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति!'

नरेंद्र गिरि जी का निधन अपूरणीय क्षति : अखिलेश यादव
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शोक व्यक्त करते हुए ट्वीट कर कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पूज्य नरेंद्र गिरी जी का निधन अपूरणीय क्षति है। ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे व उनके अनुयायियों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। भावभीनी श्रद्धांजलि।

स्तब्ध हूं, निशब्द हूं आहत हूं : केशव मौर्य
उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा- मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि पूज्य महंत नरेंद्र गिरि जी महाराज ने खुदकुशी की होगी। स्तब्ध हूं, निशब्द हूं आहत हूं। मैं बचपन से उन्हें जानता था, साहस की प्रतिमूर्ति थे। मैंने कल ही सुबह 19 सितंबर को आशीर्वाद प्राप्त किया था। उस समय वह बहुत सामान्य थे बहुत ही दुखद असहनीय समाचार है!

पूज्य महाराज जी ने देश धर्म संस्कृति के लिए जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता है। अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। भगवान से प्रार्थना है कि सभी भक्तों व शिष्यों को दुख सहने की शक्ति दें। भगवान पुण्यात्मा को चरणों में स्थान दें।

शिवराज चौहान ने कहा- योगदान हमेशा याद किया जाएगा
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट करते हुए लिखा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पूज्य संत महंत नरेंद्र गिरी जी महाराज के देवलोक गमन की दुखद सूचना मिली। सनातन धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले पूज्य स्वामीजी द्वारा समाज के कल्याण में दिए योगदान को सदैव याद किया जाएगा। ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे: बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा
बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत श्री नरेंद्र गिरी जी महाराज के देवलोक गमन की सूचना सुनकर मन स्तब्ध है। उनका निधन धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति..


Sunday, September 12, 2021

राधा तुम कभी रुक्मणि न बन पाओगी - सीमा मोटवानी

रचनाकार - सीमा मोटवानी फैज़ाबाद

राधा तुम कभी रुक्मणि न बन पाओगी,,

प्रेयसी तो हो जाओगी पर पत्नी न कहलाओगी...!!


प्रेम नाम तुमने ख़ुद साथ ही छल किया,,

कृष्ण संग चल, जग भय तज दिया,,

कृष्ण बांसुरी हो जाओगी,, पर संग न रह पाओगी,,

राधा तुम रुक्मिणी न बन पाओगी..!!


राधे-कृष्ण से जग सदा बुलाता रहे तो क्या,,!!

प्रेम प्रतिमाएं तुम्हारी लगाता रहे तो क्या,,!!

कृष्ण सिंदूर से कभी अपनी मांग न सज पाओगी,,!!

राधा तुम कभी रुक्मिणी न बन पाओगी,,!!


पुरूष प्रेम तो अस्थिर है युगों से,,

तुम्हारे बन्धन मर्यादित है तभी से,,

कृष्ण चाह मीरा भांति तुम विष भी न पी पाओगी..!!

राधा तुम अमर तो हो जाओगी,,

पर रुक्मिणी न बन पाओगी,,तुम रुक्मिणी न बन पाओगी.....!!

Wednesday, July 8, 2020

यहां लगता है भूतों का मेला!

 आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)


भारत मेलों का देश भी है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में हर वर्ष हजारों की संख्या में मेले लगते है। आपने भी कई मेलों की सैर की होगी। लेकिन क्या आपने कभी भूतों के मेले के बारे में सुना है? भले ही लोग इसे अंधविश्वास कहें, लेकिन बैतूल जिले से करीब 42 किलोमीटर दूर चिचौली तहसील के गांव मलाजपुर में हर वर्ष मकर संक्रांति की पहली पूर्णिमा से ‘भूतों का मेला’ शुरू होता है। यह मेला एक माह चलता है। ऐसी मान्यता है कि 1770 में गुरु साहब बाबा नाम के एक संत ने यहां जीवित समाधि ली थी। कहा जाता है कि संत चमत्कारी थे और भूत-प्रेत को वश में कर लेते थे। उन्ही की याद में हर वर्ष यहाँ मेला लगता है।

मेले में आने वाले भूत-प्रेत के साये से प्रभावित लोग समाधि स्थल की उल्टी परिक्रमा लगाते हैं। कई बार इस मेले को लेकर विवाद हुए। इसे अंधविश्वास के चलते बंद कराने के प्रयास भी किए गये, किन्तु ऐसा नहीं हो सका। इस मेले में देश के कई क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं। इनमें ग्रामीणों की संख्या बहुत अधिक होती है। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के कई आदिवासियों खासकर गोंड, भील एवं कोरकू जनजातियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से टोटका, झाड़ फूंक एवं भूतप्रेत-चुड़ैल सहित अनेक ऐसे रीति-रिवाज निवारण प्रक्रिया चली आ रही है। बैतूल आदिवासी बाहुल्य जनपद है। मान्यता है कि पीड़ित लोग जब यहां लगे झंडे की परिक्रमा करते हैं, तो बुरी छाया समीप के बरगद पर जाकर बैठ जाती है।

यहां आकर आप कई ऐसे दृष्य देखेंगे जिसे देखकर आप सोच में पड़ जायेंगे। किसी के हाथ में जंजीर बंधी है, तो किसी के पैरों में बेडियां है। कोई नाच रहा है, तो कोई सीटियां बजाते हुए चिढ़ा रहा है। लोग कहते हैं कि ये वे लोग है, जिन पर ‘भूत’ सवार हैं। लोग भले ही यकीन न करें, लेकिन यह सच है कि मेले में भूत-प्रेतों के अस्तित्व और उनके असर को खत्म करने का दावा किया जाता है। यहां के पुजारी लालजी यादव बुरी छाया से पीड़ित लोगों के बाल पकड़कर जोर से खींचते हैं। पुजारी कई बार झाड़ा भी लगाते हैं। यहां लंबी कतार में खड़े होकर लोग सिर से भूत-प्रेत का साया हटवाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते देखे जा सकते हैं।

एक मान्यता है कि जो पीड़ित ठीक हो जाते हैं, उसे यहां गुड़ से तौला जाता है। यहां हर वर्ष टनों गुड़ इकट्ठा हो जाता है, जो यहां आने वाले लोगों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। कहा जाता है कि यहां इतनी मात्रा में गुड़ जमा होने के बाद भी यहां मक्खियां या चीटिंयां नहीं दिखाई देतीं। लोग इसे गुरु साहब बाबा का चमत्कार मानते हैं।

यहां आकर लोग पहले स्नान करते हैं उसके बाद समाधि परिक्रमा। यहां मान्यता है कि प्रेत बाधा का शिकार व्यक्ति जैसे-जैसे परिक्रमा करता है, वैसे-वैसे वह ठीक होता जाता है। रोज यहां सायं आरती होती है। इस आरती की विशेषता यह है कि दरबार के कुत्ते भी आरती में शामिल होकर शंख, करतल ध्वनि में अपनी आवाज मिलाते है। इस पर महंत कहते है कि यह बाबा का आशीष है। इस मेले में श्रद्धालुओं के रूकने की व्यवस्था जनपद पंचायत चिचोली तथा महंत करते हैं। 

ऐसी धारणा है कि जिस भी प्रेत बाधा से पीड़ित व्यक्ति को छोडने के बाद उसके शरीर में समाहित प्रेत बाबा की समाधि के एक दो चक्कर लगाने के बाद अपने आप उसके शरीर से निकल कर पास के बरगद के पेड़ पर उल्टा लटक जाता है।  बाद में उसकी आत्मा को शांति मिल जाती है।

जो जानकारी हमें मिल सकी उसके अनुसार इस स्थल का इतिहास यह है कि विक्रम संवत 1700 के पश्चात आज से लगभग 348 वर्ष पूर्व ईसवी सन 1644 के समकालीन समय में गुरू साहब बाबा के पूर्वज मलाजपुर के पास स्थित ग्राम कटकुही में आकर बसे थे। बाबा के वंशज महाराणा प्रताप के शासनकाल में राजस्थान के आदमपुर नगर के निवासी थे। अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य छिड़े घमसान युद्ध के परिणामस्वरूप भटकते हुये बाबा के वंशज बैतूल जिले के इस क्षेत्र में आकर बस गए। बाबा के परिवार के मुखिया का नाम रायसिंह तथा पत्नी का नाम चंद्रकुंवर बाई था जो बंजारा जाति के कुशवाहा वंश के थे। इनके चार पुत्र क्रमशः मोतीसिंह, दमनसिंह, देवजी (गुरूसाहब) और हरिदास थे।

श्री देवजी संत (गुरू साहब बाबा) का जन्म विक्रम संवत 1727 फाल्गुन सुदी पूर्णिमा को कटकुही ग्राम में हुआ था। इनका खाने पीने का ढंग और रहन-सहन का तरीका बड़ा अजीबो-गरीब था। बहुत छोटी अवस्था से ही भगवान भक्ति में लीन श्री गुरू साहेब बाबा ने मध्यप्रदेश के हरदा जिले के अंतर्गत ग्राम खिड़किया के संत जयंता बाबा से गुरूमंत्र की दीक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात तीर्थाटन करते हुये अमृतसर में अपने ईष्टदेव की पूजा आराधना में कुछ दिनों तक रहें इस स्थान पर गुरू साहेब बाबा को ‘देवला बाबा’ के नाम से लोग जानते हैं। बाबा यहां से कुछ दिनों के लिये भगवान शिव की की पुण्य नगरी काशी प्रवास पर गये, जहां गायघाट के समीप निर्मित दरभंगा नरेश की कोठी के पास बाबा का मंदिर स्थित है।

बाबा की समाधि स्थल पर देख-रेख हेतु पारिवारिक परंपरा के अनुरूप बाबा के उतराधिकारी के रूप में उनके बड़े भाई महंत गप्पादास गुरू गद्दी के महंत हुये। इनके बाद यह भार उनके सुपुत्र परमसुख ने संभाला उनके पश्चात क्रमशः सूरतसिंह, नीलकंठ महंत हुये। उसके बाद 1967 में चन्द्रसिंह महंत हुये। इनकी समाधि भी यही पर निर्मित है। यहां पर विशेष उल्लेखनीय यह है कि वर्तमान महंत को छोड़कर शेष पूर्व में सभी बाबा के उत्तराधिकारियों ने बाबा का अनुसरण करते हुये जीवित समाधियाँ ली।

इसमें सबसे बड़ी विचित्रता यह है कि बाबा के भक्तों का अग्नि संस्कार नहीं होता है। बाबा के एक अनुयायी के अनुसार आज भी बाबा के समाधि वाले इस गांव मलाजपुर में रहने वाले किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके शव को जलाया नहीं जाता है चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों ना हो। इस गांव के सभी मरने वालों को उन्हीं के खेत या अन्य स्थान पर समाधि दी जाती है।

इस पर कई साइकोलॉजिस्ट भूत-प्रेत के अस्तित्व को सिरे से खारिज करते हैं। उनके अनुसार मेले में आने वाले लोग निश्चित ही किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं। उनकी परेशानी मानसिक भी हो सकती है और शारीरिक भी। मानसिक रोग से ग्रस्त परिजनों को लोग यहां ले आते हैं। दरअसल किसी भी रोग के इलाज में विश्वास महत्वपूर्ण होता है। इलाज पर विश्वास होता है तो फायदा भी जल्दी मिलता है। हालांकि यह विषय बहुत ही गूढ है। आसानी से समझ में नहीं आता। कुछ लोग इस पर विश्वास करते हैं कुछ लोग नहीं। लेकिन एैसी घटनायें होती है। इन घटनाओं का जिक्र आप समाचार पत्रों में पढ़ सकते हैं। 

इस संवत्सर पड़ेंगे पांच ग्रहण

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)
मानव सेवा रत्न से सम्मानित

सूर्य संपूर्ण जगत की आत्मा का कारक ग्रह है। संपूर्ण चराचर जगत को ऊर्जा प्रदान करता है सूर्य। अतः बिना सूर्य के जीवन की कल्पना करना असंभव है। चंद्रमा पृथ्वी का प्रकृति प्रदत्त उपग्रह है। यह स्वयं सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होकर भी पृथ्वी को अपने शीतल प्रकाश से शीतलता देता है। यह मानव के मन मस्तिष्क का कारक व नियंत्रणकर्ता भी है। कह सकते हैं कि सूर्य ऊर्जा व चंद्रमा मन का कारक है। ग्रहण एक खगोलीय घटना है। जब एक खगोलीय पिंड पर दूसरे खगोलीय पिंड की छाया पड़ती है, तब ग्रहण होता है। जब पृथ्वी पर चन्द्रमा की छाया पड़ती है तब सूर्य ग्रहण होता है। जब पृथ्वी सूर्य तथा चन्द्रमा के बीच आती है, तब चन्द्रग्रहण होता है।  
राहु-केतु इन्हीं सूर्य व चंद्र मार्गों के कटान के प्रतिच्छेदन बिंदु हैं जिनके कारण सूर्य व चंद्रमा की मूल प्रकृति, गुण, स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है। यही कारण है कि राहु-केतु को हमारे कई पौराणिक शास्त्रों में विशेष स्थान प्रदान किया गया है। राहु की छाया को ही केतु की संज्ञा दी गई है। राहु जिस राशि में होता है उसके ठीक सातवीं राशि में उसी अंशात्मक स्थिति पर केतु होता है। मूलतः राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा की कक्षाओं के संपात बिंदु हैं जिन्हें खगोलशास्त्र में चंद्रपात कहा जाता है।

ज्योतिष के खगोल शास्त्र के अनुसार राहु-केतु खगोलीय बिंदु हैं जो चंद्र के पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने से बनते हैं। राहू-केतू द्वारा बनने वाले खगोलीय बिंदु गणित के आधार पर बनते हैं तथा इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। अतः ये छाया ग्रह कहलाते हैं। छाया ग्रह का अर्थ किसी ग्रह की छाया से नहीं है अपितु ज्योतिष में वे सब बिंदु जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन ज्योतिषीय महत्व है, छाया ग्रह कहलाते हैं जैसे गुलिक, मांदी, यम, काल, मृत्यु, यमघंटक, धूम आदि। ये सभी छाया ग्रह की श्रेणी में आते हैं और इनकी गणना सूर्य व लग्न की गणना पर आधारित होती है। ज्योतिष में छाया ग्रह का महत्व अत्यधिक हो जाता है क्योंकि ये ग्रह अर्थात बिंदु मनुष्य के जीवन पर विषेष प्रभाव डालते हैं। राहु-केतु का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं बल्कि संपूर्ण भूमंडल पर होता है। जब भी राहु या केतु के साथ सूर्य और चंद्र आ जाते हैं तो ग्रहण योग बनता है। ग्रहण के समय पूरी पृथ्वी पर कुछ अंधेरा छा जाता है एवं समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं।

इस संवत्सर में कुल 5 ग्रहण लगेंगे। जिसमें से 3 मांद्य चन्द्र ग्रहण होंगे एवं 2 सूर्य ग्रहण। 
1. चन्द्रग्रहण- यह ग्रहण 5 जून को पड़ चुका है। ये छाया चन्द्रग्रहण था।  
2. खण्ड सूर्यग्रहण- यह ग्रहण भी 21 जून को पड़ चुका है। यह भारत में दिखायी दिया था। 
3. छाया चन्द्रग्रहण- यह ग्रहण 5 जुलाई को पड़ चुका है। इसका कोई भी धर्मशास्त्रीय महत्व नहीं था। 
4. छाया चन्द्रग्रहण- कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा सोमवार 30 नवम्बर 2020 को पुनः एक छाया चन्द्रग्रहण लगेगा। इसका कोई भी धर्मशास्त्रीय महत्व नहीं है। स्मरण रखने की बात है कि चन्द्रमा पृथ्वी की धूसर छाया में से होकर गुजरता है तो इस तरह की परिस्थिति बनती है। इसे मांद्य चन्द्रग्रहण भी कहते हैं।
5. खग्रास सूर्यग्रहण- मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या सोमवार 14 दिसम्बर 2020 को खग्रास सूर्य ग्रहण लगेगा। किन्तु यह सूर्य ग्रहण भारत में बिल्कुल भी दिखायी नहीं देगा। इसका कोई धर्मशास्त्रीय प्रभाव नहीं है। 

सूतक 
सूर्यग्रहण का सूतक स्पर्श समय से 12 घंटे पूर्व प्रारम्भ हो जाता है। चन्द्र ग्रहण का 9 घंटे पूर्व से। स्पर्श के समय स्नान पुनः मोक्ष के समय स्नान करना चाहिये। सूतक लग जाने पर मन्दिर में प्रवेश करना मूर्ति को स्पर्श करना, भोजन करना, मैथुन क्रिया, यात्रा आदि वर्जित है। बालक, वृद्ध, रोगी अधिक आवश्यकता होने पर पथ्याहार ले सकते हैं। भोजन सामग्री जैसे दूध, दही, घी इत्यादि में कुश रख देना चाहिये। ग्रहण मोक्ष के बाद पीने का पानी ताजा ले लेना चाहिये। गर्भवती महिलायें पेट पर गाय के गोबर का पतला लेप लगा लें। गहण अवधि में श्राद्ध, दान, जप, मंत्र सिद्धि आदि का शास्त्रोक्त विधान है। ग्रहण जहां दिखायी देता है सूतक भी वहीं लगता है एवं धर्मशास्त्रीय मान्यतायें भी लागू होती हैं तथा उसका फलाफल भी वहीं लागू होगा। 

ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से सूर्य ग्रहण
प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है ग्रहण। ज्योतिष के दृष्टिकोण से यदि देखें तो अभूतपूर्व अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान, ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियाँ एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। सूर्य ग्रहण (सूर्योपराग) तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृ्त (व्यवधान/बाधा) हो जाये। इस प्रकार के ग्रहण के लिये चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृ्थ्वी पर रहने वालों को सूर्य का आवृ्त भाग नहीं दिखाई देता।

    सूर्यग्रहण होने के लिए निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है।
    अमावस्या होनी चाहिये।
    चन्द्रमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिये।
    चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिये।
उत्तरी धु्रव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली रेखाओं को रेखांश कहा जाता है। भूमध्य रेखा के चारो वृ्ताकार में जाने वाली रेखाओं को अंक्षाश कहा जाता है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हों। चन्द्र और राहू या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिये। चन्द्र का अक्षांश लगभग शून्य होना चाहिये। यह तब होगा जब चंद्र रविमार्ग पर या रविमार्ग के निकट हों। सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य और चन्द्र के कोणीय व्यास एक समान होते हैं। इस कारण चन्द्र सूर्य को केवल कुछ मिनट तक ही अपनी छाया में ले पाता है। सूर्य ग्रहण के समय जो क्षेत्र ढक जाता है उसे पूर्ण छाया क्षेत्र कहते हैं। चन्द्रमा द्वारा सूर्य के बिम्ब के पूरे या कम भाग के ढ़के जाने के कारण ही सूर्य ग्रहण होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण व वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

 खगोल शास्त्रीयों की गणनायें
खगोल शास्त्रियों नें गणित से निश्चित किया है कि 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं। किन्तु एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण तो होने ही चाहिये। यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुये तो वो दोनो ही सूर्यग्रहण होंगे। यद्यपि वर्षभर में 7 ग्रहण तक संभाव्य हैं, फिर भी 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुनः होता है। किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं हैं, क्योंकि सम्पात बिन्दु निरन्तर चल रहे हैं।

सामान्यतः सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि चन्द्र ग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं। 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात आता है। चन्द्रग्रहणों के अधिक देखे जाने का कारण यह होता है कि वे पृ्थ्वी के आधे से अधिक भाग में दिखलाई पडते हैं, जब कि सूर्यग्रहण पृ्थ्वी के बहुत बडे भाग में प्रायः सौ मील से कम चौडे और दो से तीन हजार मील लम्बे भूभाग में दिखलाई पडते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि मध्यप्रदेश में खग्रास (जो सम्पूर्ण सूर्य बिम्ब को ढकने वाला होता है) ग्रहण हो तो गुजरात में खण्ड सूर्यग्रहण (जो सूर्य बिम्ब के अंश को ही ढंकता है) ही दिखलाई देगा और उत्तर भारत में वो दिखायी ही नहीं देगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण में सूर्य ग्रहण
ग्रहण का समय दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिये भी बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्राह्मंड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनायें घटित होतीं हैं जिससे कि वैज्ञानिकों को नवीन तथ्यों पर कार्य करने का अवसर मिलता है। 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक नें सूर्य ग्रहण पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था। आईन्स्टीन का यह प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही सही सिद्ध हो सका, जिसमें उन्होंने अन्य पिण्डों के गुरुत्वकर्षण से प्रकाश के पड़ने की बात कही थी। चन्द्रग्रहण तो अपने संपूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता है किन्तु सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिकतम 11 मिनट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं। संसार के समस्त पदार्थों की संरचना सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही संभव है। यदि सही प्रकार से सूर्य और उसकी रश्मियों के प्रभावों को समझ लिया जाये तो समस्त धरा पर आश्चर्यजनक परिणाम लाये जा सकते हैं। सूर्य की प्रत्येक रश्मि विशेष अणु का प्रतिनिधित्व करती है और जैसा कि स्पष्ट है, प्रत्येक पदार्थ किसी विशेष परमाणु से ही निर्मित होता है। अब यदि सूर्य की रश्मियों को पूंजीभूत कर एक ही विशेष बिन्दु पर केन्द्रित कर लिया जाये तो पदार्थ परिवर्तन की क्रिया भी संभव हो सकती है।

भारतीय वैदिक काल और सूर्य ग्रहण
वैदिक काल से पूर्व भी खगोलीय संरचना पर आधारित कलैन्डर बनाने की आवश्कता हुई। सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से 400 वर्ष पूर्व ही उपलब्ध थी। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है। ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक, वैदिक, वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आये हैं।

सूर्य ग्रहण के समय हमारे ऋषि-मुनियों के कथन
हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन का निषेध किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणुओं की बहुलता होती है। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिये ऋषियों ने पात्रों में कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जायें। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिये बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जायें और धुल कर बह जायें।

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की संतान हैं। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं। चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिये, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिये गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें। ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कुछ भी कैंची या चाकू से काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलने से रोका जाता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं।

ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिये। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किये गये हैं। कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्मण को दान देने का विधान है। तुलसी का पौधा शास्त्रों के अनुसार पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सक्षम है। इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट आस-पास मौजूद दूषित कणों को मार देते हैं। इसलिये तुलसी को खाद्य पदार्थों में डालने से उस भोजन पर ग्रहण का असर नहीं होता। 
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Sunday, July 5, 2020

पक्ष फलादेश- श्रावण कृष्ण पक्ष (6 से 20 जुलाई)

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(वरिष्ठ सम्पादक-इडेविन टाइम्स)
पक्ष के 3 सोमवार एवं सोमवारी अमावस्या से युक्त 15 दिनां का पूर्ण पक्ष अत्यन्त शुभ फलकारक है। 6 जुलाई से ही श्रावण मास का प्रारम्भ हो रहा है। चातुर्मास में किया जाने वाला, अक्षुण दाम्पत्य जीवन की कामना से अशून्य शयन का व्रत चन्द्रोदय व्यापिनी द्वितीया तिथि में पक्षारम्भ 6 जुलाई सोमवार को किया जायेगा। चन्द्रोदय रात 08ः05 बजे चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जायेगा। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत का मान 8 जुलाई बुधवार को होगा। चन्द्रोदय रात 09ः32 बजे चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जायेगा। मध्यान्ह व्यापिनी सप्तमी तिथि में शीतलासप्तमी का मान 12 जुलाई रविवार को होगा एवं आज ही सप्तमी तिथि रविवार के योग में भानु सप्तमी का पर्व मनाया जायेगा। इसमें किये जाने वाला स्नान-दान सूर्य ग्रहण में किये जाने वाला स्नानदान के बराबर फलदायी माना जाता है। कामदा (कामिका) एकादशी व्रत का मान सबके लिये 16 जुलाई गुरूवार को होगा। पुत्र की कामना से शनि प्रदोष का व्रत 18 जुलाई को किया जायेगा। मास शिवरात्रि व्रत का मान भी 18 जुलाई शनिवार को होगा। स्नान दान एवं श्राद्ध सहित श्रावणी अमावस, हरियाली अमावस्या एवं सबसे बढ़कर सोमवती अमावस्या का मान 20 जुलाई सोमवार को है। ‘अश्वत्थ मूले.........’ विहित मंत्र का उच्चारण करते हुये सौभाग्यवती स्त्रियां पति सौख्य वृद्धि की कामना से पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा करेंगीं। माना जाता है कि आज के ही दिन भगवान विष्णु का निवास पीपल वृक्ष की जड़ में हो जाता है। इसी विश्वास के साथ इसको किया जाता है। पुनर्वसू नक्षत्र का सूर्य पक्षारम्भ 6 जुलाई सोमवार को दिन 08ः20 बजे से आयेगा। इसमें सर्वत्र बहुत अच्छी वर्षा के योग मिल रहे हैं। 16 जुलाई गुरूवार को कर्क राशि की सूर्य संक्रान्ति रात 09ः25 बजे से आयेगी और इसी के साथ सूर्य दक्षिण पथगामी (दक्षिणायन) हो जायेगे। इसमें भी सर्वत्र अच्छी वर्षा के योग बन रहे हैं। 10 से 20 जुलाई के बीच में सर्वत्र व्यापक वर्षा की संभावना है।

श्रावण शुक्ल पक्ष (21 जुलाई से 3 अगस्त) का पक्ष फलादेश अगले अंक में पढ़े........................