Tuesday, June 9, 2020

वो बेघर याद आ गये

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
( सम्पादक- इडेविन टाइम्स)

यादों की गठरी खुली, कच्चे घर याद आ गये,
ख्वाबों में डूबे तो, परियों के द्वार आ गये।

देखो आईने इस शहर के, बदले चेहरों पे चहरे
किस कदर देखों ये पत्थर याद आ गये।

खुले आकाश में बैठा क्या मैं पल दो पल,
पिन्जरे वो निर्दयी याद आ गये।

सब कुछ है घर में फिर चैन मिलता नहीं क्यों,
घरों से हुये वो बेघर याद आ गये।

फूलों पे चलकर क्यों छाले उभर आये,
खेतों की मेंड़ों के कंकर याद आ गये।

तन्हा हूं भीड़ में कोई अपना मिले,
फिर वो तन्हाई के मंजर याद आ गये।

रेत के जैसी फिसल रही डोर आहिस्ता-आहिस्ता,
बाहों में लिपटे वो मंजर याद आ गये।




एक रामकथा और कई रामायण 

 आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
(सम्पादक- इडेविन टाइम्स)

 राम कथा सर्वत्र व्याप्त है। भारत ही में नहीं अपितु विदेशों में भी प्रचलित है। भारत के अलग-अलग प्रान्तों में तो विभिन्न रामायणों के रूप में रामकथा की परम्परा है, साथ ही विदेशों में भी भगवान श्रीराम के मर्यादापुरूषोत्तम रूप का विवेचन करने वाली कई रामायणों की रचना की गयी है। इसी का नतीजा है कि आज रामकथा विश्वव्यापिनी बन गयी है।

रामकथा के रूप में जिस ग्रन्थ का सर्वप्रथम नाम लिया जाता है वह है महर्षि वाल्मिकि की रचना ‘‘वाल्मीकीय रामायण’’। वाल्मीकीय रामायण को स्मृत ग्रन्थ माना गया है। वर्णन प्राप्त होता है कि इस ग्रन्थ की रचना माता सरस्वती की कृपा से हुई थी। साथ ही इस ग्रन्थ को ऋतम्भरा प्रज्ञा की देन बताया जाता है। यह ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है।

अब नाम आता है रामचरितमानस का। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास द्वारा संवत् 1633 विक्रमी में सम्पन्न हुई थी। इसकी भाषा अवधी है। इस काव्य की रचना में 2 वर्ष 7 माह और 26 दिन लगे थे। इस ग्रन्थ में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के रूप में 7 काण्ड हैं। इन सातों काण्डों में ही राम का सम्पूर्ण चरित्र समाहित किया गया है।

महर्षि व्यास ने आध्यात्म रामायण की रचना की। ब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड में यह कथा उपलब्ध है। इसकी रचना भी संस्कृत भाषा में हुई है। इस ग्रन्थ में भगवान श्रीराम को आध्यात्मिक तत्व माना गया है। महर्षि वाल्मीकी की एक रचना और मानी जाती है वह है आनन्दरामायण। इस रामायण को भी सारकाण्ड, जन्मकाण्ड, मनोहरकाण्ड, राज्यकाण्ड आदि काण्डों में बांटा गया है। इसकी भाषा संस्कृत है। इस रामायण में राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक महत्व के साथ-साथ श्रीराम के मर्यादापुरूषत्व को आधार बनाया गया है।

अद्भुतरामायण की रचना भी संस्कृत में हुई है। इस रामायण में 27 सर्ग हैं और लगभग 14 हजार श्लोक हैं। इसमें सीता जी के महात्म्य को विशेषरूप से दर्शाया गया है। इस कथा के अनुसार सहस्त्रमुख नाम का भी रावण था जो दशमुख रावण का अग्रज था। सीता ने महाकाली का रूप धारण करके सहस्त्रमुख रावण का वध किया था। योगवशिष्ठरामायण की रचना भी महर्षि वाल्मीकी की कृति मानी जाती है। इसके दूसरे नाम योगवसिष्ठ महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठरामायण, ज्ञानवासिष्ठरामायण भी हैं। इस ग्रन्थ में वैराग्य प्रकरण, मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण, उत्पत्ति प्रकरण, उपशम प्रकरण तथा निर्वाण प्रकरण (पूर्वाद्ध एवं उत्तरार्द्ध) के रूप में श्रीराम के चरित्र को 6 प्रकरणों में बांटा गया है। साथ ही इसमें श्रीराम के मानवीय चरित्र को विस्तृत रूप से दर्शाया गया है।

संस्कृत भाषा में टीका के रूप में रचित प्रेमरामायण भी उपलब्ध है। यह श्रीरामचरितमानस की प्राचीन संस्कृत टीका मानी जाती है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी के पट्टशिष्य रामू द्विवेदी ने की थी। कृत्तिवासारामाण की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्म से लगभग 100 वर्ष पूर्व हुई थी। इसकी भाषा बंगला है। कृत्तिवासा द्वारा रचित इस रामायण में भी बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, उत्तरकाण्ड आदि हैं। पवार छन्दों में पांचालीगन के रूप में रचित इस ग्रन्थ में श्रीराम के उदार चरित्रों का वर्णन किया गया है।
द्रविण भाषा (तेलुगु)  में भी एक रामायण की रचना हुई जिसका नाम है रंगनाथरामायण। इसकी रचना श्रीगोनबुद्धराज द्वारा देशज छन्दों में सन 1380 के आस-पास की गयी थी। इस रामायण में युद्धकाण्ड के माध्यम से श्रीराम को महाप्रतापी बताया गया है। रावण के कुकृत्यों की निन्दा के साथ ही उसके गुणों का भी इसमें वर्णित की गयी है। उडिया भाषा में आदि कवि श्रीशारलादास द्वारा बिलंकरामायण की रचना हुई। यह रामायण पूर्वखण्ड तथा उत्तरखण्ड के रूप में दो खण्डों में है। शिव-पार्वती के संवाद के रूप में रचित यह रामायण भगवती महिषासुरमर्दिनी की वन्दना से प्रारम्भ हुई है। इसी उडिया भाषा में जगमोहनरामायण की रचना भी हुई, जिसके रचनाकार सन्त बलरामदासजी हैं। सारे उत्कल प्रदेश में इसकी प्रसिद्धि दाण्डिरामायण के नाम से है। उडिया भाषा में एक अन्य रामायण विचित्ररामायण के नाम से भी प्राप्त होती है। इसके रचनाकार विश्वान खुंटिया हैं।
महाकवि कम्ब ने कम्बरामायण की रचना तमिल भाषा में की। इसमें 6 काण्ड हैं। प्रत्येक काण्ड में कथाओं को पटलों में विभक्त किया गया है। श्रीराजगोपालाचारी जी ने इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद भी किया है। महाकवि बत्तलेश्वर ने कन्नड़भाषा में तोरवेरामायण की रचना की। यह रामायण शिव-पार्वती के संवाद के रूप में वर्णित है।
दिवाकर प्रकाश भट्ट ने कश्मीरी भाषा में कश्मीरीरामायण की रचना की। इस रामायण को रामावतारचरित के नाम से भी जाना जाता है। इसे प्रकाशरामायण भी कहते हैं। इसका हिन्दी रूपान्तरण काशुररामायण के नाम से प्राप्त होता है। इसमें भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य का वर्णन हुआ है। कवि गिरधर द्वारा गुजराती भाषा में रचित गिरिधररामाण प्रसिद्ध है। गुजराती भाषा में इसका वही स्थान है जो हिन्दी में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का। मध्यकालीन गुजराती कवि उद्धव द्वारा रचित उद्धवरामायण भी प्राप्त होती है। गुजरात प्रान्त के आदिवासियों में डांगीरामायण तथा वहां के भील जाति में भलोडीरामायण का प्रचलन है। इसके अलावा जैन कवि श्रीजिनराय सुरि रचित जैनरामायण तथा लोकगीतों पर आधारित लोकरामायण भी गुजरात प्रान्त में रामकथा के रूप में प्रसिद्ध है।

छत्रपति शिवाजी के गुरू समर्थ स्वामी रामदास ने लधु-बृह्त रामायण की रचना की। यह मराठी साहित्य के अन्तर्गत है। सन्त एकनाथ द्वारा रचित भावार्थरामायण प्राप्त होती है। राजस्थानी भाषा में कवि मंह रचित मंहरामायण प्राप्त होती है। इसमें कुल 261 छन्द हैं। इसकी रचना सन् 1518 ई0 के आसपास हुई मानी जाती है। पंजाबी भाषा में गोविन्दरामायण के नाम से एक रामायण भी मिलती है। इसकी रचना सिखों के दसवें गुरू गोविन्दसिंह जी द्वारा हुई थी। इसमें मुख्य रूप से भगवान श्रीराम के दुष्टसंहारक और अभयदाता रूप का वर्णन हुआ है। श्रीराम की पत्नी जनकनन्दिनी सीता मिथिला की थीं। वहां की मैथिली भाषा में भगवान श्रीराम के पावन चरित का प्रणयन हुआ है। इसका नाम मैथिलीश्रीरामचरितमानस है। इसके रचनाकार श्रीरामलोचन शरण जी हैं।
इन रामायणों के अतिरिक्त और भी कई रामायण हैं जैसे- विष्णुप्रतापरामायण, मैथिलीरामायण, दिनकररामायण, शंकररामायण, शर्मारामायण, ताराचन्दरामायण, अमररामायण, नेपालीरामायण, मन्त्ररामायण, कीर्तनियारामायण, प्रीतिरामायण (ये गीतों में उपलब्ध हैं), शत्रुंजयरामायण, खोतानीरामायण, तिब्बतीरामायण, चरित्ररामायण, ककविनरामायण, जावीरामायण, जानकीरामायण आदि की रचना भारत के अतिरिक्त विदेशों में भी की गयी है। भारत की ही भांति दक्षिण पूर्व एशिया के देशों, विशेषकर थाईलैन्ड, कम्बोडिया, लाओस, मलेशिया, इण्डोनेशिया आदि में रामकथा की लोकप्रियता है। थाईलैंड में प्रचलित रामायण का नाम रामकियेन हैं, जिसका अर्थ है राम की कीर्ति। कम्बोडिया की रामायण रामकेर नाम से प्रसिद्ध है। लाओस में फालक फालाम और फोमचक्र नाम से दो रामायणें प्रचलित हैं। मलेशिया यद्यपि मुस्लिम राष्ट्र है, किन्तु वहां भी हिकायत सिरीरामा नामक रामायण का प्रचलन है, इसका अर्थ होता है रामकथा। इण्डोनेशिया में महाकवि ककविन द्वारा रचित ककविन रामायण प्रसिद्ध है।

नेपाल में भी भारत की ही भांति वहां के जन जीवन में रामकथा समा गयी है। वहां श्रीरामचरितमानस का नेपाली भाषा में कवि एवं नाटककार पहलमान सिंह स्वार ने अनुवाद किया है। श्रीभानुभक्त ने नेपालीरामायण की रचना उन्नीसवीं शताब्दी में की थी। इसका दूसरा नाम भानुभक्तरामायण भी है। इस प्रकार रामकथा का विस्तार भारत में ही नहीं अपितु कई देशांं हुआ है। अन्त में यही कहा जा सकता है कि ‘‘रामायन सत कोटि अपारा’’ या ‘‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’’।

कैसा होता है मृत्यु के बाद का जीवन 

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
’’मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(पत्रकार एवं आध्यात्मिक लेखक)

मानव का शरीर एक घर की भांति है। इसमें जीवात्मा 70-80 वर्ष तक रहती है। यदि इसे अपना वास्तविक घर समझने लगें तो उस मानव का उस शरीर के प्रति मोह हो जाता है तथा आसानी से वह उसे छोड़ना नहीं चाहती। फिर परिवार, सम्पत्ति आदि का मोह भी बाधा बन जाता है। एैसी स्थिति में मनुष्य मरते समय बहुत घबराता है तथा उसके प्राण किसी मोह में फंसे होने के कारण शरीर को आसानी से छोड़ते नहीं। जिसका मोह जितना अधिक होता है उतनी ही उसे शरीर छोड़ने में वेदना होती है। शरीर व्यर्थ हो चुका है एवं जीवात्मा उसे छोड़ना नहीं चाहती, ऐसी स्थिति में काफी समय तक उसे जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करना पड़ता है। 
उस समय उसके परिजन इस मोह को छुड़ाने के लिये उसके सभी परिजनों को बुला लेते हैं जिससे उसकी उनसे मिलने की इच्छा शान्त हो जाये। मोह भंग करने के लिये उसे गीता भी सुनाई जाती है। उसके सामने गऊदान, एकादशी व्रत करना, गायों को घास डालना, दान-पुण्य करना आदि का संकल्प भी किया जाता है। जीवात्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जो शरीर की मृत्यु के बाद भी उससे अलग होकर जीवित रहता है तथा अपने स्थूल शरीर के समीप खड़ा होकर अपने मृत देह को इस प्रकार देखता रहता है जैसे वह किसी अन्य के शरीर को देख रहा हो। वह उस शरीर में पुनः प्रवेश नहीं कर सकता किन्तु मोहवश उसे छोड़कर जाता भी नहीं। काफी समय तक तो उसे विश्वास भी नहीं होता कि वह मर गया है। उसे अपनी मृत्यु का विश्वास दिलाने के लिये शव को दाह संस्कार के लिये जब-जब उठाते हैं तो उसके परिजन रोना-धोना करते हैं। यह जीवात्मा कभी शरीर के प्रति मोहवश श्मशान तक जाता है तथा अपने ही शरीर को जलते हुये देखता है तो उसे विश्वास हो जाता है कि वह मर गया है तथा इसके बाद ही वह अपनी अगली यात्रा पर निकल जाता है।

हिन्दुओं में मृत शरीर को जलाने (दाह संस्कार) की पृथा है। इसमें भी सभी परिजनों का सम्मिलित होना एक धार्मिक कृत्य मानकर आवश्यक माना जाता है। सभी के सामने परिजन शव को चिता में रखते हैं तथा उसका ज्येष्ठ पुत्र उसमें अग्नि देता है। वही ज्येष्ठ पुत्र अन्त में कपाल क्रिया करता है जिसका अर्थ है कि अन्य अंगों के जल जाने पर भी मस्तिष्क में उसकी चेतना रह जाती है जिससे मुक्ति दिलाना है। दाह संस्कार के पीछे दुसरा कारण यह भी है कि स्थूल शरीर के मृत होने पर भी उसके भीतर का छाया शरीर उसके आस-पास मंडराता रहता है तथा 36 घंटे के भीतर वह जीवात्मा उसको भी मृतवत छोड़कर उसमें से निकल जाती है। यदि शव को गाड दिया जाये तो वह उस कब्र के ऊपर मंडराता हुआ धीरे-धीरे नष्ट होता है क्योंकि स्थूल शरीर के प्रति जो उसका आकर्षण था वह समाप्त हो जाता है। इसलिए शव को गाड़ने की अपेक्षा उसका दाह संस्कार करना अधिक अच्छा है। दाह संस्कार के पीछे हिन्दुओं की यही धारणा है।

दूसरी बात यह भी है कि हिन्दू आत्मा को ही महत्व देते हैं। शरीर का महत्व तभी तक है जब तक कि उसमें आत्मा है। आत्मा निकल जाने पर शरीर मिट्टी भर है किन्तु आत्मा का उससे मोह रह जाने के कारण ही उसका विधिवत दाह संस्कार किया जाता है। उसे मिट्टी मानकर फेंका नहीं जाता। इसमें जल्दी भी की जाती है जिससे कि आत्मा को अधिक समय तक उस शरीर के आस-पास भटकना न पडे़ एवं शीघ्र ही अपनी अगली यात्रा आरम्भ कर दे। यहां तक कि दूसरे या तीसरे दिन उसकी अस्थियां भी गंगा या अन्य पवित्र नदी में प्रवाहित कर दी जाती हैं।

जीवात्मा का स्थूल एवं छाया शरीर के नष्ट हो जाने पर उसका उसके घर एवं परिवार जनों से मोह बना रहता है जिसे छोड़ने में उसे थोड़ा समय लगता है। सामान्य आत्माएं मृत्यु के बाद शीघ्र ही नया गर्भ खोज लेती हैं किन्तु कुछ को 3 वर्ष तक प्रतीक्षा करना पड़ती है। कुछ को इससे भी अधिक। हिन्दुओं की मान्यता है कि यह जीवात्मा 13 दिन तक घर में ही रहती है। इसके बाद वह प्रेतयोनि में रहती है। इस प्रेतयोनि से उसकी मुक्ति के लिये 13 दिन के बाद भी कई प्रकार के क्रिया कर्म किये जाते हैं जिससे वह प्रेतयोनि से मुक्ति पाकर आगे की यात्रा में निकल जाती है। तेरह दिन तक उस तीवात्मा का घर में निवास मानकर उसके लिये 12 दिन तक शोक मनाते हैं, करूड पुराण सुनाकर उसे उस अशरीरी दुनियां की सुचना दी जाती है जिससे वह अपरिचित है। जीवात्मा के प्रतीक के रूप में उसके कमरे में जल से भरा हुआ कलश भी रखते हैं जिसे ‘‘श्रावणी कलश’’ कहा जाता है तथा उस घर में घी का दीपक जलाते हैं क्योंकि उस सूक्ष्म शरीरधारी जीवात्मा को तेज प्रकाश असह्य होता है। दसवें, ग्यारहवें एव बारहवें दिन उसका क्रिया कर्म एवं पिण्डदान भी किया जाता है जिससे वह जीवात्मा तृप्त होती है।
तेरहवें दिन उस जीवात्मा को विदाई दी जाती है। उस समय श्रावणी के कलश को किसी पीपल के पेड़ के नीचे जाकर रख आते है तथा आते समय पीछे मुडकर भी नहीं देखते वरना वह जीवात्मा फिर उसके साथ घर पर आ जाती है। पीपल में देवताओं का निवास माना गया है इसलिए उस जीवात्मा को उनके पास ले जाकर छोड़ आते हैं जिससे वह प्रेतयोनि में न पड़े। उस दिन गरूडपुराण की भी समाप्ति कर दी जाती है तथा वहां से लौटकर घर मे ढोल बज जाती है जो शुभ का प्रतीक है। इसी दिन उत्तराधिकारी की रस्म अदा की जाती है। बाहर दिन तक जीवात्मा का घर में निवास मानकर अन्य उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया जाता।

जैसे ही जीवात्मा अपना स्थूल शरीर छोड़ती है उसका नये लोक में प्रवेश हो जाता है। यह लोक इस स्थूल लोक से सूक्ष्म है तथा जीवात्मा भी अपने सूक्ष्म शरीर से ही इसमें प्रवेश करती है। इस लोक का उसे पूर्व अनुभव नहीं है न इसकी प्रकृति से परिचित ही है। इस लोक का विस्तार इस स्थूल लोक से भी अधिक है। वहां जीवात्मा का केवल भौतिक शरीर ही नहीं होता, न कोई भौतिक साधन सुविधाएं ही होती हैं बाकी सब कुछ होता है। यहां उसके सगे-सम्बन्धी, मित्र आदि भी मिल जाते हैं यदि उनका पुनर्जन्म न हुआ हो अथवा आगे के लोकों में उनकी गति नहीं हुई हो। इस लोक में प्रवेश करने के बाद इस संसार की स्मृति उसे थोड़े समय रहती है, फिर वह भूल जाता है, जिस प्रकार स्वप्न टूटने पर थोड़े समय ही उसकी स्मृति रहती है। मृत्यु स्वप्न टूटने के समान ही है तथा इसके बाद यह संसार स्वप्नवत ही ज्ञात होने लगता है। नये लोक में प्रवेश के बाद वह इस संसार की सभी सुखद एवं दुखद अनुभूतियों से मुक्त हो जाता है।

जिस प्रकार घर छोड़कर विदेश जाने वाले को घर की याद सताती रहती है तथा नये वातावरण में जमने में उसे थोड़ा समय लगता है। इसी प्रकार मृत्यु के नये वातावरण में जमने में उसे थोड़ी कठिनाई होती है। यदि पहले ही घर का मोह उसे छुड़ा दिया जाये तो वह अपने नये स्थान पर शीघ्र ही सामंजस्य बिठा लेता है। इस पुराने घर से मोह दुड़ाने के लिये भारत ने कई प्रयोग किये हैं। तिब्बत में भी इसके कई प्रयोग हुये हैं। मृत्यु के समय यह जीवात्मा स्थूल शरीर सहित समस्त स्थूल लोक एवं स्थूल पदार्थों का त्याग कर देता है। केवल इस जन्म में किये गये सभी शुभ-अशुभ कर्मों के संस्कार स्मृतियां, अनुभव, कर्म आदि की गठरी बांध कर अपने साथ ले जाता है। इन्हीं से जीवात्मा का सूक्ष्म शरीर बनता है जो उसका स्वशरीर है। इस जीवात्मा के एक नहीं बल्कि सात शरीर हैं जिसका निर्माण उसकी घनता के आधार पर हुआ है। सबसे स्थूल यह स्थूल शरीर था जो छूटा है। अन्य 6 शरीर अभी विद्यमान हैं। जीवात्मा द्वारा की गई प्रगति के अनुसार ये 6 शरीर भी क्रम से छूटते जाते हैं तथा ज्यों-ज्यों जीवात्मा घनत्व वाले शरीर छूटते जाते हैं त्यों-त्यों जीवात्मा हल्की होकर आगे के लोकों में गमन करती जाती है। सातों शरीर नष्ट होने पर ही वह मुक्त होकर परमात्मा में लय होने का अनुभव करती है। इसलिए प्रत्येक शरीर का छूटना उसकी प्र्रगति का सूचक है। कुछ व्यक्ति इसी जन्म में साधना द्वारा सातों शरीरों को नष्ट कर देते हैं जिससे वे मृत्यु के बाद सीधे ही मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं।

उनका अन्य किसी लोक में गमन नहीं होता ऐसे व्यक्ति ‘‘जीवनमुक्त’’ कहलाते हैं। जीवात्मा का यह सूक्ष्म शरीर मुक्ति पर्यन्त बना रहता है तथा इसी के द्वारा वह विभिन्न लोकों में गमन करता है। सूक्ष्म शरीर के छूट जाने पर नया शरीर ग्रहण नहीं हो सकता। यह सूक्ष्म शरीर ही पुनर्जन्म ग्रहण करता है।

मृत्यु के बाद जीवात्मा सूक्ष्म शरीर को त्यागकर सर्वप्रथम जिस सूक्ष्म लोक में प्रवेश करती है उसे ‘‘कामलोक’’ या ‘‘प्रेत लोक’’ कहते हैं। यह स्थूल लोक से कम घना किन्तु अन्य लोकों से अधिक घना होता है। जिन जीवात्माओं पर अशुभ कर्म संस्कारों का भार अधिक होता है उनका घनत्व अधिक होने से ये इसी लोक में रूक जाती हैं। उत्तम जीवात्माएं हल्की होने से वे शीघ्र ही इसे छोड़कर आगे के इससे भी सूक्ष्म लोकों में चली जाती हैं। जीवात्मा के सात शरीरों की गति उन्हीं के अनुकूल लोक में होती है। इस प्रेत लोक में जीवात्मा को अपने कर्मों एवं वासना के अनुसार सुख-दुखों की अनुभूति होती है। इस लोक में कष्ट झेलकर जीवात्मा शुद्ध होती है तथा शुद्ध होकर वह इससे मुक्त होकर आगे के लोक में प्रवेश करती है जो इससे अधिक सूक्ष्म हैं। प्रेतात्मा का लिंग शरीर भी सात परतों वाला होता है जिसमें यह प्र्रेत बन्द रहता है। उनके नष्ट हुये बिना उसकी इस लोक से मुक्ति नहीं हो सकती।

प्रत्येक परत में वह थोड़े समय रहता है फिर वह उसे छोड़कर मुक्ति की ओर बढ़ता है। साधारण जीव अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार 5 से 50 वर्ष तक रहता है। जिनकी आत्मोन्नति अधिक हो गयी है उनकी ये परतें शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं जिससे वह अगले लोक में शीघ्र ही चला जाता है। जो उपयुक्त आहार-विहार से अपना जीवन शुद्ध रखता है तथा जिसकी वासना मन्द रहती है वह शीघ्र ही स्वर्ग लोक पहुंच जाता है। बीच के लोकों का उसे ज्ञान भी नहीं रहता। जिसकी पाश्विक वृत्तियां रही हैं वे इस प्रेत लोक के अनुकूल खण्ड में ही जायेंगे।
अकाल मृत्यु, हत्या, आत्महत्या, दुर्घटना, यृद्ध में मरने वालों के लिये अलग नियम हैं। यदि वे जीव शुद्ध हैं, यदि लोकहित में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया है तो उनकी विशेष रक्षा होती है। उनकी जितनी आयु बाकी रह गई है उतने समय वे आनन्द दायक निद्रा में रहते हैं किन्तु अन्य लोगों को होश बना रहता है। बहुतों को मरते समय की बातों का विस्मरण नहीं होता। वे कामलोक की गहरी परत में ही रहते हैं। आयु समाप्त होने पर वे कामलोक में जाते हैं। वे उस मृत्यु की पीड़ा का बार-बार अनुभव करते हैं। ऐसी मृत्यु किसी बुरे प्रारब्धवश ही होती है। जीव की सभी आशा, तृष्णा, राग, द्वेष उसमें रहते है इसी से वह दूसरों को देखता भी है तथा उनके कार्यों में हस्तक्षेप करता है। अन्य सहायक उन्हें आगे जाने में सहायता करते हैं किन्तु इन प्रेतों के यह समझ में नहीं आता। ये प्रेत दूसरे मनुष्यों के शरीर अपने वश में करके नये कर्म करते रहते हैं जिनका फल उन्हें भविष्य में अवश्य भोगना पड़ता है। अकाल मृत्यु बुरी समझी जाती है। जब यह जीव पुनः जन्म लेता है तो ये ही वृत्तियां बीज रूप में विद्यमान रहती हैं। इस प्रकृति के कोश के नाश होने पर ही उसकी आगे के लोक में गति होती है।
हिन्दुओं में जीवात्मा की इस प्रेतयोनि से मुक्ति के लिये अनेक कर्म किये जाते हैं जिनमें वार्षिक श्राद्ध, गया श्राद्ध आदि हैं तथा अन्तिम श्राद्ध बद्रीनाथ में किया जाता है। इसके बाद यह माना जाता है कि वह जीवात्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर अगले लोक में चली गई है। अथवा उसका पुनर्जन्म हो चुका है। प्रेतयोनि थोड़ी बहुत सभी को भोगनी पड़ती है। केवल जीवनमुक्त ही इससे वंचित रहते हैं।

जीवात्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। शरीर की मृत्यु पर भी जीवात्मा जीवित रहती है। जो लोग मृत्यु के मुख से वापस लौटे हैं उन्होने जो वर्णन किया है डाक्टरों ने उसका निष्कर्ष निम्न प्रकार निकाला है- ‘‘मृत्यु के बाद मृतक स्वयं अपने को अपने भौतिक शरीर से अलग हवा में उठा हुआ पाता है। वह अपने सगे-सम्बन्धियों को उसका शोक मनाते, रोते-चिल्लाते स्पष्ट देखता है। वह उनकी आवाजें भी सुनता है किन्तु उसकी आवाज कोई नहीं सुन सकता। वह अपने पार्थिव शरीर की अन्त्येष्टि होते भी देखता है। अन्ततः उसे एक अन्धेरी गुफा में होकर जाने की अनुभूति होती है। फिर वह स्वयं को एक प्रकाश लोक में पाता है। यहां उसके मित्र परिवार के सभी दिवंगत आत्माएं उससे मिलती हैं और उसकी सहायता करती हैं। इस दिव्यलोक में उसे असीम आनन्द प्रेम व सुख की प्राप्ति होती है। वह पुनः इस भौतिक शरीर में आना नहीं चाहता किन्तु किसी अज्ञात प्रेरणा से उसे पुनः आना पड़ता है।

एैसे सैकड़ों उदाहरण है जिससे यह सिद्ध होता है कि मृत्यु के उपरान्त भी हमारी सूक्ष्म सत्ता विद्यमान रहती है तथा पुनर्जन्म के समय यही अपने उपयुक्त भौतिक शरीर में प्रवेश करती है। पुनर्जन्म की भी कई घटनाएं हैं जिसमें आत्माएं अपने पूर्व जन्म का हाल बताती हैं। वे अपने नाते-रिश्तेदारों को भी पहचान लेती हैं। इन सबका यही अर्थ है कि मृत्यु सिर्फ शरीर की होती है। जीवात्मा बार-बार शरीर परिवर्तन करती रहती है। सम्मोहन क्रिया के द्वारा भी व्यक्ति को अपने पूर्व जन्मों में प्रवेश कराकर इस चेतना का हाल जानने की कोशिश की जाती है। मृत्यु जीवन का एक शाश्वत सत्य है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती किन्तु इसे सुखद बनाया जा सकता है, जिससे भावी जीवन अधिक उन्नत एवं समृद्ध बन सके, यह मानव के हाथ में है। दैवी शक्तियां इसे अधिक उन्नत बनाने में सदा सहयोग करती रहती हैं किन्तु अज्ञानवश मुनष्य स्वयं अपना पतन कर लेता है। जिसके लिये यह प्रकृति जिम्मेदार नहीं है।

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Saturday, June 6, 2020

अकेलापन जीवन का चरम सत्य है
 आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)


जीवन एक मोटी पुस्तक की तरह है। जिसका एक पृष्ठ आपके सामने खुला है। उसे देखकर आप आज की बात जान सकते हैं पर अन्य पृष्ठों पर क्या-क्या छपा है यह बात तुरन्त नहीं बताई जा सकती। ईश्वर बड़ी सावधानी से एक-एक शब्द, एक-एक पंक्ति और एक-एक पृष्ठ हमारे सामने खोलता रहता है। यदि इस पूरी पुस्तक विचारधारा, जीवन का पूरा लेखा, हमें पहले ही पता चल जाये तो शायद अनिष्ट की बाट देखते-देखते ही हम मृत्यु के ग्रास बन जायें। जीवन तो प्रगतिशील है, चलता जाता है। मरने वाले मरते हैं। डूबने वाले डूबते-उतरते हैं। गिरते हुये को देखकर हमें विचलित नहीं होना है। बस चले चलो। सफर में आगे क्या होगा, देखा जायेगा।
हमें दो प्रकार की शिक्षाएं मिलती हैं। पहली वह जो अपने गुरूजनों या संसार से प्राप्त करते हैं, दूसरी वह जो स्वयं अकेला चलकर अपने अनुभवों से संचित करते हैं। संसार की सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो मनुष्य स्वयं सतत संसार एवं समाज में संघर्ष द्वारा प्राप्त करता है। आत्मनिर्भर ही सर्वत्र पूजा जाता है। जिन व्यक्तियों पर आपने आशा के विशाल महल बना रखे हैं, वे कल्पना के आकाश में विहार करने के समान अस्थिर, सारहीन, खोखले हैं। अपनी आशा को दूसरे में संलिष्ट कर देना स्वयं अपनी मौलिकता का हृस कर अपने साहस को पंगु बना देता है। जो व्यक्ति दूसरों के बल पर जीवन यात्रा करता है, वह शीघ्र ही अकेला रह जाता है।

जो अपना सुख और प्रसन्नता दूसरों में ढूंढता रहता है, उनके सुख में सुखी, उनकी नाराजगी में अस्तव्यस्त हो जाता है, वह जीवन भर दूसरों की गुलामी में फंसा रहता है। दूसरों के आदेश में हर्ष, प्रसन्नता, घृणा, क्रोध, उद्वेग का अनुभव करने वाला व्यक्ति उस बच्चे की तरह है जो दूसरे की गोदी से उतरना ही नहीं चाहता। मनुष्य के सुख, साहस, उत्साह, प्रफुल्लता का कन्द्र किसी बाह्य सत्ता में नहीं है। सोचिए, आज जिस व्यक्ति की प्रसन्नता से आप भावी जीवन के सुख सपनें निर्मित कर रहे हैं, यदि कल वह आपसे मुंह मोड़ ले, अनायास ही नाराज हो जाये या चल बसे, तो आपका सुख कहां जायेगा? दूसरे को अपने जीवन का संचालक बना देना ऐसा ही है, जैसा अपनी नौका को एक ऐसे प्रवाह में डाल देना, जिसके अन्त का आपको कोई ज्ञान नहीं।

इस जगत में दो व्यक्ति एक सी रूचि, एक स्वभाव, एक दृष्टिकोण या विचारधारा के मिलना बड़ा कठिन है। जितने मस्तिष्क, उतने ही उनके सोचने-विचारने के ढंग। रहन-सहन की अलग-अलग पद्धतियां। पोशाक पहनने के तीरके अलग। भोजन सबका भिन्न-भिन्न। एक सरल सीधी खाद्य वस्तुओं में, सूखी रोटी में मधुर स्वाद लेता है तो दूसरे को मिर्च-मसाले से बने पदार्थ व श्रृंगारिक उत्तेजक भोजन प्रिय है। एक ठंडा जल पीकर आन्तरिक शान्ति का अनुभव करता है तो दूसरा बर्फ से युक्त सोडा, लेमन, शर्बत, ठंडाई या मद्यपान चाहता है। एक 6 घण्टे सोकर नया जीवन लेता है, दूसरा 10 घंटे पलंग तोड़ता है।

यह जगत विभिन्न तत्वों, मन्तव्यों तथा जीवन दर्शन वाले व्यक्ति समूहों से विनिर्मित किया गया है। फिर किस प्रकार आप अपनी योग्यता, अभिरूचि अथवा साम्य विचारधारा का व्यक्ति पाने की आशा कर रहे हैं? आपको अपने जैसा व्यक्ति प्राप्त होना कठिन है। आपको अपने जीवन पथ पर अकेले ही अग्रसर होना पड़ेगा। कब तक दूसरों का सहारा ढूंढते रहोगे। कोई आपके साथ दूर तक नहीं चल पायेगा। बस अकेले चले चलिए।
जीवन एक यात्रा है। यात्रा में कुछ समय के लिए एक-दो संगी-साथी आपको मिल जाते हैं। इनसे चार दिन के लिये आप बोलते-बतियाते हैं। हंसी-ठट्टा, संघर्ष, छीना-झपटी चलती है। साथ-साथ कुछ समय तक आगे बढ़ते हैं, किन्तु धीरे-धीरे उनकी जीवन यात्रा समाप्त होती चलती है। एक के पश्चात दूसरा आपको छोड़ता चलता है। इस तरह एक दिन आप अकेले पड़ जाते हैं। तब इस अकेलेपन को सोचकर आपका मन कुछ समय के लिए अशान्त हो उठता है। उसमें एक कडुवाहट सी आ जाती है। पर वास्तव में जीवन का यह अकेलापन ही मानव जीवन का परम सत्य है। 

सबको पाकर भी हम सब अकेले हैं, नितान्त अकेले! जिन्हें हम भ्रमवश अपने साथ चलता हुआ समझते हैं, वास्तव में वे हमारे अल्पकालीन सहयात्री मात्र हैं। हमारे इस अकेलेपन में कोई भी हांथ बटाने वाला नहीं मिलेगा। हम अकेले ही आये हैं, अकेले जीवनपर्यन्त चलते रहे, अकेले ही निरन्तर बढ़ते रहेंगे। हमें अपने दोनों पावों पर ही चलना है। कोई आपको उठाकर जीवन यात्रा पार नहीं करा सकता। ये तो स्वयं ही करना होगा।
रोज नये-नये रूप बनाकर मनुष्य इस अकेलेपन को भूलाने का प्रयास करता रहता है। भीड़-भाड़ से भरे हुये विशाल नगरों में निवास करता है। अपने परिवार का विस्तार करता है। किन्तु वह मूर्ख नहीं जानता कि वह इस माया चक्र से वह स्वयं ही उलझन में फंस रहा है। सूखी रेत से पानी की आशा रखता है। बालू में से तेल निकालना चाहता है। हवा में किले बनाना चाहता है। दूसरे के बल पर चलने, उनसे हमेशा आशा रखने या निरन्तर सहायता चाहने का यह मायाजाल मृगमरीचिका नहीं तो क्या है?

आपको अकेलेपन से भयभीत नहीं होना है। बियावान जंगल हो या भीड़-भाड़ वाले नगर आप बस चले चलो। अकेलापन आपकी निजी आन्तरिक प्रदेश में छिपी हुई महान शक्तियों को विकसित करने का साधन है। जितना ही आप अपनी शक्तियों से कार्य लेते हैं, उतना ही उनकी वृद्धि या विकास होता है। अकेले हैं, तो डरें नहीं। हतोत्साह न हों। बस आप अपनी शक्तियों का इस मर्यादा तक विकास करें कि दूसरों के आश्रय की हमेशा आवश्यकता न पड़े। अपनी सोई हुई गुप्त शक्तियों को जाग्रत करें। इस जीवन यात्रा में कोई मिल जाये तो ठीक। न मिले तो ठीक। आप अपनी यात्रा के मुख्य उद्वेश्य पर ध्यान केन्द्रित करते हुये चले चलो।

क्या कहता है वायु पुराण ?
आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)


हम लाये हैं पाठकों के लिये हजारों पृष्ठों में फैले महान हिन्दू-धर्म-ग्रन्थ 18 पुराणों की सहज और सरल जानकारी संक्षिप्त रूप में। इसमें आख्यान हैं, जो पुराणों की विशालता में इंर्ट की तरह मजबूती से जड़े हैं। भारतीय जीवन शैली को समझने और उसे आज के संदर्भ में अपनाने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हैं। पुराण ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं, जो वैदिक सभ्यता और सनातन धर्म का पूर्ण परियच देते ही हैं, साथ ही मनुष्य की जीवन शैली को सही रास्ता दिखाते हैं। आज के बेहद जटिल और व्यस्त दौर में व्यक्ति को इतनी फुर्सत ही नहीं कि वह इस विशाल ज्ञान-गंगा में गोते लगाकर ज्ञान प्राप्त कर सके, जबकि हम सब इस समृद्ध वांग्मय को जानने व समझने के लिय काफी विचलित रहते हैं। पुराणों की विस्तृत व विशाल शब्द संपदा का संक्षिप्तीकरण मुझ जैसे साधारण व्यक्ति के लिये दुस्साहस ही है। परन्तु पाठकों के मन में यदि यह प्रयास अपनी संस्कृति, जीवन शैली व धर्म के प्रति बीज रूप में अपनी जड़ स्थापित कर गया, तो मुझे विश्वास है कि आप स्वयं पुराणों के वट वृक्ष की छाया का आनन्द लेंगे। इसी श्रृंखला में वायुपुराण को जानिए-

वायु पुराण काफी प्राचीन पुराण है। इसका साक्ष्य इसी पुराण के अध्याय 61 के श्लोक 119-120 में प्राप्त होता है। इस समय परिक्षित के पुत्र जनमेजय के पुत्र शतानीक के पुत्र अश्वमेघदत्त के पुत्र अधिसामकृष्ण का राज्य चल रहा है। उन्हीं के राज्यकाल में यह पुराण कुरूक्षेत्र में संकलित हुआ। यह भी इसकी एक विशिष्टता है, क्योंकि शेष सभी पुराणों की रचना नैमिषारण्य में हुई। ( यहां यह बात भी जानने योग्य है कि परम योगीराज व महामहिम पंडित गोपीनाथ कविराज जी ने अपनी पुस्तक ज्ञानगंज में यह रहस्य बताया है कि कुरूक्षेत्र में वायु तत्व प्रधान है और यह वायु तत्व का भुवन है)। वाणभट्ट ने अपनी कादंबरी में भी इस पुराण का उल्लेख किया है। यह पुराण अन्य पुराणों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा है। इसमें केवल 112 अध्याय हैं तथा मात्र 11 हजार श्लोक हैं, जो 4 खंडों में विभाजित हैं। जिन्हें पाद कहा गया है- प्रक्रिया पाद, अनुषंग पाद, उपोद्धात पाद और उपसंहार पाद।
यह पुराण 2 भागों पूर्व व उत्तर में विभाजित है। इसके आरम्भ में सृष्टि प्रकरण बड़े ही विस्तार के साथ कई अध्यायों में फैला हुआ है। इस पुराण में कल्पों का निरूपण अन्य पुराणों से भिन्न है। सृष्टि की एक-एक संस्था को कल्प का नाम दिया गया है। इसमें बताया गया है कि सर्पप्रथम आनंद स्वरूप शिव होते हैं। फिर वह इच्छा और तप से सृष्टि में प्रवृत्त होते हैं। अतः प्रथम तीन कल्प हैं- भव, भुव और तप। इसी प्रकार सूर्य, मेघ, अग्नि आदि की उत्पत्ति को भी एक कल्प कहा गया है। मेघां के प्रादुर्भाव से दामिनी चमकती है। मेघों को विष्णु रूप व विद्युत को रूद्र रूप महेश्वर बताया गया। इस कल्प निरूपण की एक विशिष्टता बीच-बीच में गान के स्वरों की उत्पत्ति बतलाई गयी है और बीच-बची में यज्ञ संस्थाओं की। स्वरपूर्वक सामगान में यज्ञ व इससे सृष्टि के उत्पन्न होने की बात कही गई है।

वायुपुराण भौगोलिक वर्णन के लिये विशेष पढ़ने योग्य है। जंबूद्वीप का वर्णन तो विशेषरूप से बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है, जो अध्याय 34 से 39 तक वर्णित है। खगोल का वर्णन भी अन्य पुराणों की भांति इस ग्रंथ में अध्याय 50 से 53 तक विस्तार से उपलब्ध होता है। युग, यज्ञ, ऋषियों व तीर्थों का भी बहुत विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है। वेदों की शाखाओं का वर्णन भी साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। प्राचीन ब्राह्मण वंशों के इतिहास को जानने के लिये अध्याय 61-65 में प्रजापति वंश वर्णन, कश्यपीय प्रजासर्ग (66-69) व ऋषिवंश (70) में बहुत उपयोगी सामग्री उपलब्ध होती है। 86 व 87वां अध्याय संगीत से संबंधित बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। यह पुराण भगवान शिव के चरित्र का इतने विस्तार से वर्णन करता है कि कुछ विद्वान तो इसे शिवपुराण का एक भाग होने की भूल कर बैठते हैं। पशुपति की पूजा से संबद्ध पाशुपत योग इस पुराण की एक विशिष्टता है। अन्य किसी भी पुराण में इतने विस्तार से पाशुपत योग का विवरण प्राप्त नहीं होता।
इस पुराण के उत्तर भाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है। नर्मदा जल को ही ब्रह्मा, विष्णु व शिव स्वरूप माना गया है तथा इसे पृथ्वी पर शिव की दिव्य द्रव्य शक्ति माना गया है, जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते हैं। वह भगवान के रूद्र के अनुचर होते हैं और जिनका दक्षिण तट पर निवास है। वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होते हैं। ऊंकारेश्वर से लेकर परिचय समुद्र तट नर्मदा जी में दूसरी नदियों के 35 पापनाशक संगमों की स्थिति बताई गयी है। जिनमें से 11 उत्तर तट पर और 23 दक्षिण तट पर स्थित बताये गये हैं। 35वां संगम तो स्वयं नर्मदा व समुद्र का संगम है। नर्मदा जी के महात्म्य के अतिरिक्त शार्वस्तव व 10 प्रजापति द्वारा भगवान शिव की स्तुति भी इस ग्रन्थ के महत्वपूर्ण अंशों में एक है। मुख्यतः शैव तत्व प्रधान होने पर भी इसमें भगवान विष्णु गदाधर का भी आख्यान (अध्याय 105-112) तक प्राप्त होता है। जिसमें मधु कैटभ की कथा तथा मोहिनी जन्म की कथा का प्रसंग मिलता है। इसके अतिरिक्त मुत्यु पूर्व के लक्षण, स्वर, ऊंकार, लिंगोद्भव, गंधर्व, मूर्छना लक्षण, गीत और अलंकार तथा गया तीर्थ आदि का भी वर्णन प्राप्त होता है।

भौतिक विज्ञानवेत्ता महर्षि भरद्वाज 

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)


ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा महर्षि भरद्वाज बताये गये हैं। इस मण्डल में भरद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भरद्वाज के 23 मन्त्र प्राप्त होते है। वैदिक ऋषियों में ऋषि भरद्वाज का बहुत उच्च स्थान है। इनकी माता का नाम ममता और पिता का नाम बृहस्पति था। ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रद्रष्टा हैं और एक पुत्री रात्रि जो कि रात्रिसूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है। भरद्वाज के मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम इस प्रकार हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋषि का कशिपा भरद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भरद्वाज की 12 सन्तानें मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। 

भरद्वाज ऋषि ने बड़े गहन अनुभव किये थे। उनकी शिक्षा के आयाम अतिव्यापक थे। भरद्वाज ने इन्द्र से व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया था और उसे व्याख्यासहित अनेक ऋषियों को पढ़ाया था। ‘‘ऋक्तन्त्र’’ और ‘‘ऐतरेय ब्राह्मण’’ दोनों में इसका वर्णन है। भरद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद भी पढ़ा था, ऐसा चरक ऋषि ने लिखा है। अपने इस आयुर्वेद के गहन अध्ययन के आधार पर भरद्वाज ने आयुर्वेदसंहिता की रचना भी की थी। भरद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र का उपदेश लिया था और ‘‘भरद्वाज-स्मृति’’ ग्रन्थ की रचना की। महाभारत, शान्तिपर्व (182/5) तथा हेमाद्रि नामक ग्रन्थ में इसका उल्लेख मिलता है। पाच्चरात्र भक्ति सम्प्रदाय में प्रचलित है कि सम्प्रदाय की एक संहिता ‘‘भरद्वाज संहिता’’ के रचनाकार भी ऋषि भरद्वाज ही थे।
महाभारत, शान्तिपर्व (210/21) के अनुसार ऋषि भरद्वाज ने धनुर्वेद पर प्रवचन किया था। वहां (58/3) में यह भी कहा गया है कि ऋषि भरद्वाज ने राजशास्त्र का प्रणयन किया था। कौटिल्य ने अपने पूर्व में हुये अर्थशास्त्र के रचनाकारों में ऋषि भरद्वाज को स्वीकारा है।  ऋषि भरद्वाज ने ‘‘यन्त्रसर्वस्व’’ नामक एक बड़े ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘‘विमान शास्त्र’’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये कई प्रकार की धातुओं के निर्माण का वर्णन है।
इस प्रकार एक साथ व्याकरणशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञानवेत्ता ऋषि भरद्वाज थे। इस बात को अनेक ग्रन्थ और अन्य ग्रन्थों में दिये उनके ग्रन्थों के उद्धरण ही प्रमाणित करते हैं। उनकी शिक्षा के विषय में एक मनोरंजक घटना तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रन्थ में प्राप्त होती है। घटना कुछ इस प्रकार है-

भरद्वाज ने सम्पूर्ण वेदों के अध्ययन का यत्न किया। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर तपस्या से इन्द्र को प्रसन्न किया। भरद्वाज ने प्रसन्न हुये इन्द्र से अध्ययन हेतु 100 वर्ष की आयु मांगी। भरद्वाज अध्ययन करते रहे। सौ वर्ष पूरे हो गये। अध्ययन की लगन से प्रसन्न होकर पुनः 100 वर्ष अध्ययन के लिये और मांगे। इन्द्र ने 100 वर्ष प्रदान किये। इस प्रकार अध्ययन और वरदान का क्रम चलता रहा। भरद्वाज ने 300 वषों तक अध्ययन किया। इसके बाद पुनः इन्द्र ने उपस्थित होकर कहा- ‘‘हे भरद्वाज! यदि मैं तुम्हें 100 वर्ष और दे दूं तो तुम उनसे क्या करोगे? भरद्वाज ने सरलता से उत्तर दिया- ‘‘मैं वेदों का अध्ययन करूंगा।’’ इन्द्र ने तत्काल बालू के 3 पहाड़ खडे़ कर दिये, फिर उनमें से एक मुट्ठी हाथों में लेकर कहा- ‘‘भरद्वाज, समझो ये तीन वेद हैं और तुम्हारा 300 वषों का अध्ययन यह मुट्ठी भर रेत है। वेद अनन्त हैं। तुमने आयु के 300 वषों में जितना जाना है, उससे न जाना हुआ अत्यधिक है।’’ अतः मेरी बात पर ध्यान दो- ‘‘अग्नि सब विद्याओं का स्वरूप है। अतः अग्नि ही जानो। उसे जान लेने पर सब विद्याओं का ज्ञान स्वतः ही हो जायेगा, इसके बाद इन्द्र ने भरद्वाज को सावित्र्य अग्नि विद्या का विधिवत ज्ञान कराया। भरद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत तत्व प्राप्त किया और स्वर्गलोक में जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया। (तै0ब्रा0 3/10/11)। महर्षि ने इन्द्र द्वारा अग्नि तत्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएं की। आयुर्वेद प्रयोगों में वे बहुत निपुण थे। इसीलिये उन्होने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की। वे ब्राह्मण ग्रन्थों में ‘‘दीर्घजीवितम’’ पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं। (ऐतरेय आरण्यक 1/2/2)। चरक ऋषि ने भरद्वाज को ‘‘अपरिमित’’ आयुवाला कहा (सूत्र स्थान 1/26)।
भरद्वाज ऋषि काशिराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्ही मन्त्रदृष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था (जै0ब्रा0 3/2/8)। वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भरद्वाज ऋषि को ‘‘अनूचानतम’’ और दीर्धजीवितम’’ या ‘‘अपरिमित’’ आयु कहे जाने में को अतिश्योक्ति नहीं है।
ऋषि भरद्वाज ने ‘‘सामगान’’ को देवताओं से प्राप्त किया था। ऋग्वेद दसवें मण्डल में कहा गया है- ‘‘यों तो समस्त ऋषियों ने ही यज्ञ का परम गुह्य ज्ञान जो बुद्धि की गुफा में गुप्त था, उसे जाना, परन्तु भरद्वाज ऋषि ने द्युस्थान (स्वर्गलोक) के धाता, सविता, विष्णु और अग्नि देवता से ही बृहत्साम का ज्ञान प्राप्त किया’’ (ऋक्0 10/181/2)। यह बात भरद्वाज ऋषि की श्रेष्ठता और विशेषता दोनों दर्शाती है। साम का अर्थ है (सा और अमःः) यानि ऋचाओं के आधार पर आलाप। अर्थात ऋचाओं के आधार पर किया गया गान साम है। भरद्वाज ने ‘‘बृहत्साम’’ को आत्मसात किया था। ब्राह्मण ग्रन्थों की परिभाषाओं के सन्दर्भ में हम कह सकते हैं कि ऋचाओं के आधार पर स्वरप्रधान ऐसा गायन जो स्वर्गलोक, आदित्य, मन, श्रेष्ठत्व और तेजस को स्वर आलाप में व्यंज्जित करता हो, ‘‘बृहत्साम’’ कहा जाता है।

ऋषि भरद्वाज ऐसे ही बृहत्साम गायक थे। वे चार प्रमुख साम गायकों, गोतम, वामदेव, भरद्वाज और कश्यप की श्रेणी में गिने जाते हैं। संहिताओं में ऋषि भरद्वाज के इस ‘‘बृहत्साम’’ की बहुत महिमा वर्णित है। काठकसंहिता में तथा ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि ‘‘इस बृहत्साम के गायन से शासक सम्पन्न होता है तथा ओज, तेज और वीर्य बढ़ता है। राजसूय यज्ञ समृद्ध होता है। राष्ट्र और दृढ़ होता है (ऐत0 ब्रा0 36/3)। राष्ट्र को समृद्ध और दृढ़ बनाने के लिये भरद्वाज ने राजा प्रतर्दन से यज्ञ में इसका अनुष्ठान कराया था, जिससे प्रतर्दन का खोया राष्ट्र उन्हें पुनः मिला था’’ (काठक 21/10)। प्रतर्दन की कथा महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 30) में वर्णित है।
भरद्वाज जी का कहना था कि मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिये साहस और बल की आवश्यकता होगी। इसके लिये आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें। जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें। हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे और हमारी बुद्धिओं को निन्दित मार्ग से रोके। वे कहते हैं कि हमारी सरस्वती, हमारी विद्या इतनी समर्थ हो कि वह सभी प्रकार के मानवों का पोषण करे। इस प्रकार के और भी कई प्रेरक विचार ग्रन्थों में भरे पड़े है उनके। महर्षि भरद्वाज एक ज्ञानी, विज्ञानी, शासक, कुशल योद्धा थे।

Saturday, May 30, 2020

*उपछाया चंद्रग्रहण 5 जून को*



5 जून को ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को अपछाया चंद्रग्रहण भारत में दिखाई देगा। ये पूर्ण ग्रहण नहीं होगा। इसलिए सूतक नहीं लगेगा। इस ग्रहण में चंद्रमा ग्रसित नहीं होगा। जातकों पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं होगा। ये ग्रहण रात 11:16 बजे से 2:34 बजे तक दिखेगा। 

निर्जला एकादशी व्रत 2 जून को रहेगा। 

✍🏻 *आचार्य डॉ प्रदीप द्विवेदी*
वरिष्ठ सम्पादक- इंडेविन टाइम्स समाचार पत्र
संस्थापक/ अध्यक्ष- स्वामी विवेकानंद व्यक्तित्व विकास संस्थान