Friday, December 23, 2022

 गोपेश्वर गौशाला के तत्वाधान में श्री राम कथा का आयोजन


मलिहाबाद। श्री गोपेश्वर गौशाला के तत्वाधान में नव दिवसीय राम कथा का आयोजन श्री राम धर्मशाला में किया जा रहा है। चित्रकूट धाम से पधारे पंडित रामकिंकर युग तुलसी की कृपा पात्र व्यास जीके मिश्र के शिष्य आचार्य राजेंद्र मिश्र ने भक्तों को भरत चरित्र की कथा पर प्रकाश डालते डालते हुए कहा रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भारत की तुलना समुद्र से की है।और उनके हृदय में श्रीराम के प्रति जो प्रेम है वह अमृत समान है। रामचरितमानस में श्री राम जी का चरित्र तो महान है ही और उनसे ज्यादा अगर किसी का चरित्र महान है तो वह है भरत जी। व्यास जी ने लक्ष्मण और भरत के चरित्र की तुलना करते हुए बताया की लक्ष्मण का चरित्र आकाश के समान है जिसमें रात्रि में चंद्र तारे आज सब कुछ दिखता है लेकिन भरत का चरित्र समुद्र के समान है रात्रि कालीन में समुद्र के किनारे खड़े होने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता है।राम और भरत संवाद सुन उपस्थित भक्त भावविभोर हो गए। रामकथा में विशेष रुप से उमाकांत गुप्ता प्रदीप गुप्ता विश्वनाथ गुप्ता अभिषेक गुप्ता आशीष गुप्ता शैलेंद्र पांडे रुपेश मिश्र संजय साहू ग्राम प्रधान कसमंडी कला पंकज गुप्ता महिला मंडल अध्यक्ष शिवानी गुप्ता सुनील गुप्ता सहित सैकड़ों भक्त और गोपेश्वर गौशाला परिवार उपस्थित रहा।

Monday, September 20, 2021

कर्नाटक में 800 साल पुराने महादेवम्मा मंदिर को गिराने पर बोम्मई सरकार घिरी, हिंदू संगठन नाराज

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

बेंगलुरु

कर्नाटक में बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को हिंदू संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कारण- मैसूर के पास एक पुराने मंदिर के विध्वंस और गणेश विसर्जन पर कोविड प्रोटोकॉल के लिए सख्ती बरतना। विरोध को भांपते हुए सरकार ने ‘अवैध मंदिरों’ को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अस्थाई रोक लगा दी है।

राज्य में इस सूची में 1000 से अधिक मंदिर हैं। मुख्ममंत्री बोम्मई ने कहा कि वे अन्य मंदिर को ध्वस्त होने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। हालांकि, गणेश विसर्जन का मुद्दा अभी भी उबल रहा है। चामराजनगर में जिला प्रशासन ने गणेश विसर्जन के लिए जुलूस की अनुमति देने से मना कर दिया, इसके बाद शहर के विद्या गणपति के आयोजकों ने प्रतिमा को विसर्जित नहीं करने का फैसला किया है। दूसरी तरफ, मैसूर जिले में नंजनगुड के पास हुचुगनी आदिशक्ति महादेवम्मा मंदिर को हटाए जाने से लोग ज्यादा गुस्से में हैं। मंदिर का निर्माण 9वीं सदी में चोल वंश के शासन के दौरान हुआ था।

मैसूर से भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा फैसले के विरोध में खड़े हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शोभा करंदलाजे ने कहा कि राज्य सरकार को विध्वंस शुरू करने से पहले स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना चाहिए था। 2008 से पहले बने मंदिरों को नियमित करने का प्रावधान है।’ जिला प्रशासन ने अपने बचाव में कहा कि उन्होंने सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया है। वहीं नंजनगुड तहसीलदार मोहन कुमारी ने दावा किया कि लोगों को तोड़फोड़ की सूचना दी गई थी।

हिंदू संगठन विरोध कर रहे, 10 दिन का अल्टीमेटम
हिंदू जागरण वैदिक ने मैसूर जिला प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए सरकार को 10 दिन का अल्टीमेटम देते हुए राज्यव्यापी आंदोलन की धमकी दी है। श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक कहते हैं कि हिंदुओं को आत्मरक्षा के लिए हथियार रखना होगा। भाजपा हिंदुओं को नीचा दिखाकर खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश कर रही है। यह मंदिर विध्वंस भी खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए एक व्यवस्थित कदम है। वे कहते हैं कि अवैध चर्च, दरगाह और मस्जिदें विध्वंस की सूची में क्यों नहीं हैं? हिंदू महासभा के सचिव धर्मेंद्र कहते हैं कि मंदिर गिराना पीठ पर छुरा घोंपने जैसा कदम है।

शादीशुदा पुरुष भी सह रहे प्रताड़ना, घरेलू हिंसा के मामलों में 40% शिकायतें पतियों ने की

 भारत डाॅट समाचार टाइम्स

  • सर्वे के मुताबिक ज्यादातर पुरुष सेल्फ रिस्पेक्ट के चलते अपनी पत्नी की शिकायत नहीं कर पाते।
  • हाल ही में हरियाणा के एक शख्स का वजन शादी के बाद कथित तौर पर पत्नी के अत्याचार की वजह से 21 किलो घट गया।
  • दुर्भाग्य से हमारे देश में पति के पास पत्नी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम जैसा कानून नहीं है... यह टिप्पणी कुछ महीने पहले ही मद्रास हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले को लेकर दी थी। सवाल उठा कि क्या पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं? हाल ही में इसका उदाहरण भी देखने को मिला। हरियाणा में हिसार के रहने वाले एक शख्स का वजन शादी के बाद कथित तौर पर पत्नी के अत्याचार की वजह से 21 किलो घट गया। इसी के आधार पर उसे हाईकोर्ट से तलाक की मंजूरी मिल गई। ऐसे मामले बढ़े हैं। बहुत से लोगों के लिए ये सोचना भी अविश्वसनीय है कि पुरुषों के साथ हिंसा होती है। वजह ये है कि पुरुषों को हमेशा से मजबूत और ताकतवर माना जाता रहा। लेकिन पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए चलाए जा रहे तमाम परामर्श केंद्रों के आंकड़े इसका प्रमाण हैं कि पुरुष भी महिलाओं के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायतों में करीब 40 फीसद शिकायतें पुरुषों की हैं। इसमें ये बात भी सामने आई है कि महिलाओं को तलाक ही एकमात्र विकल्प सुझता है, वहीं पुरुषों का काउंसलिंग पर जोर होता है। यानी काउंसलिंग या किसी भी तरह से पुरुष रिश्ते को जारी रखना चाहते हैं।
  • क्या महिलाएं पुरुषों को करती है प्रताड़ित?
    साल 2018 में व्हेन वाइफ बीट देयर हसबैंड, नो वन वांट्स टु बिलीव इट नामक शीर्षक से प्रकाशित लेख में कैथी यंग ने कई रिसर्च का जिक्र किया। इससे ये पुष्टि हुई कि वायलेंट रिलेशनशिप में महिलाओं के एग्रेसिव होने की आशंका पुरुषों जितनी ही है।
    क्या कहता है डेटा
    वैसे तो, भारत में ऐसा कोई सरकारी आकंड़ा नहीं मिला, जिससे घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों का पता चल सके। लेकिन पुरुषों के अधिकारों के लिए कार्यरत कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन की ओर से टेलीफोनिक सर्वे किया गया। इस दौरान इंदौर की पौरुष संस्था और राष्ट्रीय पुरुष आयोग समन्वय समिति दिल्ली को भी पुरुष हेल्पलाइन पर कई शिकायतें मिली। इसमें पाया गया कि लॉकडाउन के दिनों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों को प्रताड़ित करने के मामलों में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई क्योंकि कई पुरुष काम छोड़कर घर पर बैठने गए, या फिर ऑफिस बंद होने से वर्क फ्रॉम होम करने लगे। ऐसे में वे पत्नियों के रवैये से डिप्रेशन में रहने लगे।

    सेल्फ-रिस्पेक्ट गंवाने के डर से शिकायत नहीं कर पाते
    कई संस्थाओं के सर्वे के मुताबिक ज्यादातर पुरुष सेल्फ रिस्पेक्ट के चलते अपनी पत्नी की शिकायत नहीं कर पाते। अगर कोई हिम्मत कर पुलिस को शिकायत करता भी है, तो अक्सर पुलिस ही उसे धमका देती है। वैवाहिक जीवन में पुरुष किस तरह प्रताड़ित होते है इसका उदाहरण प्रशासनिक व्यवस्था के बड़े ओहदों पर बैठे पुरुषों के मामले में भी देखने को मिला।
    केस- 1
    साल 2018 में कानपुर के पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) के पद पर तैनात रहे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास की जहरीला पदार्थ खाने के कारण मौत हो गई। जांच में घरेलू कलह के कारण आत्महत्या की बात सामने आई।
    केस- 2
    साल 2017 में बिहार के आइएएस अधिकारी मुकेश कुमार ने पत्नी से विवाद के कारण गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी थी। सुसाइड नोट में लिखा था कि वह अपनी पत्नी और अपने मां-बाप के बीच हो रहे झगड़े से बेहद परेशान थे।
    घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को नहीं देता सुरक्षा?
    नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट की मानें तो महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते हैं। इसकी एक मुख्य वजह परिवार में चल रही कलह और रिश्तों से उपजा डिप्रेशन भी है। वहीं, साल 2019 में 'इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन' की रिसर्च के अनुसार हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में 21-49 वर्ष की उम्र के एक हजार विवाहित पुरुषों में से 52.4 फीसद ने जेंडर आधारित हिंसा का अनुभव किया। इन आकड़ों को देख लगता है कि जब संविधान लिंग, जाति और धर्म के आधार पर किसी तरह का फर्क स्वीकार नहीं करता, तो क्यों घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को सुरक्षा नहीं देता? जबकि विकसित देशों में जेंडरलेस कानून वहां के पुरुषों को न केवल महिलाओं की तरह घरेलू हिंसा से प्रोटेक्शन देता है, बल्कि इस बात को भी स्वीकार करता है कि पुरुष भी प्रताड़ित होते हैं।

  • क्या तलाक से डरते हैं पुरुष?
    सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन और माई नेशन संस्था के ऑनलाइन शोध की मानें तो 98 प्रतिशत भारतीय पति तीन साल के रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके हैं। दिल्ली हाइकोर्ट में वकील योगेंद्र ने बताया कि भारत में दहेज निरोधक कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, दुष्‍कर्म से संबंधित कानून सहित महिलाओं की सुरक्षा के लिए और भी कई कानूनी प्रावधान अमल में लाए गए हैं। लेकिन पुरुषों के साथ हिंसा के लिए कोई कानून नहीं। एक दशक पहले जहां एक हजार में मुश्किल से एक मैरिड कपल्स तलाक के लिए कोर्ट पहुंचता था, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़ गया है। पुरुषों के कई मामले आते है जो अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हैं और तलाक लेने की स्थिति से लगभग रोज गुजरते हैं। जब तलाक का कदम उठाते भी हैं तो उन्हें डर होता है कि कहीं उनका पक्ष सुने बिना ही क्रूर करार न दिया जाए।
    क्या महिलाओं के लिए बने कानूनों का हो रहा दुरुपयोग?
    साल 2018 में उत्तर प्रदेश में दो सांसदों ने ये मांग उठाई कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग भी बने। इसे लेकर प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था। इन्हीं में से एक सांसद का दावा था कि आज ऐसे कई पुरुष झेल में हैं, जो पत्नी प्रताड़ित है। लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में बदनामी के डर की वजह से वे घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहें। कई तो सुसाइड करने को मजबूर हैं। पुरुष आयोग की मांग का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। कई तरह से पुरुषों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अमेरिका के कानून से प्रेरित होकर धारा 498-ए बनाई गई। लेकिन दहेज प्रताड़ना का ये कानून भी एकतरफा नजर आया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2012 में इस कानून के तहत दर्ज मामलों में 1,97,762 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इन मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसद है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर महज 15 फीसद। वहीं, बलात्कार से संबंधित धारा 376 के तहत महिला का आरोप लगाने से ही आरोपी की गिरफ्तारी हो जाती है। अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दिल्ली में रेप के कुल 2,753 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1,464 मामले झूठे थे।

  • एंटी-मेल सोच बदलने को संस्थाएं कर रही काम
    भारत में पहले पुरुषों के अधिकारों को लेकर कम ही आवाज उठती थी, लेकिन अब विभिन्न राज्यों में मेन्स राइट्स ऐक्टिविस्ट बैठक करने लगे हैं। यहां तक कि कई बार वे सड़कों पर उतरकर अपने हकों की बात भी करते हैं। मेन वेलफेयर ट्रस्ट के मेंबर सौरभ सिंह ने बताया कि हमारे देश में महिलाओं के मुकाबले शादीशुदा पुरुष ज्यादा सुसाइड कर रहे हैं। इससे उनके डिस्ट्रेस लेवल का पता चलता है। देश के अलग अलग राज्यों में काम कर रहीं हमारी संस्था को हर महीने 4 से 5 हजार पुरुषों की शिकायतें मिलती है। इसमें रिक्शा वाले से लेकर आईएएस ऑफिसर तक के लोग शामिल हैं। अधिकतर फाल्स रेप केस, मोलेस्टेशन, अननेचुरल सेक्स, झुठे मैरिज रेप के आरोपों से जुड़ी शिकायतों को लेकर फोन करते है।पुरुषों को जागरूक किया जाता है कि वे अपने हक की आवाज उठाएं। पुरुष हेल्पलाइन नंबर 8882-498-498 भी जारी किया गया है। इसके जरिये कोई भी पीड़ित पुरुष कभी भी फोन कर मदद मांग सकता है।

महिलाओं के लिए मातम से कम नहीं अजन्मे बच्चे को खोना

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

मैं अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए बहुत उत्साहित थी। शादी के पांच साल बाद ये मेरी पहली प्रेग्नेंसी थी। बच्चे का नाम भी सोच लिया था। घर पर अकेले बैठे घंटों उससे बातें करती। एक दिन अचानक शरीर के निचले हिस्से में दर्द होने लगा। मुझे महसूस हुआ कि ब्लीडिंग की वजह से मैं पूरी तरह भीग गई हूं। पति के साथ अस्पताल गई। वहां पहुंचकर पता चला कि जिस बच्चे के जन्म के सपने देख रही थी, वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। ये किस्सा है दिल्ली की रेखा की जिंदगी का। उनकी आवाज में अपने अजन्मे बच्चे को खोने का दर्द साफ झलकता है। ये दर्द सिर्फ एक महिला का नहीं है बल्कि 31 शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम के सर्वे की मानें तो दुनिया भर में हर साल करीब 23 मिलियन मिसकैरेज होते हैं। इनमें 50 में से एक महिला जीवन में दो बार मिसकैरेज का अनुभव करती है, जबकि एक प्रतिशत महिलाएं तीन या इससे अधिक बार। ये स्थिति मानसिक रूप से हिला देने वाली होती है। इससे न सिर्फ महिला, बल्कि उसके पार्टनर पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मिसकैरेज की सटीक वजह के बारे में तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन कुछ खास मेडिकल कंडीशन के दौरान महिला को अलर्ट रहने की जरूरत होती है।

क्या है मिसकैरेज?
जब प्रेग्‍नेंसी के 20वें सप्‍ताह से पहले ही भ्रूण नष्‍ट हो जाए तो इस स्थिति को मिसकैरेज कहा जाता है। ज्यादातर मामलों में प्रेग्‍नेंसी की पहली तिमाही में मिसकैरेज होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में कम से कम 30% प्रेग्नेंसी मिसकैरेज की वजह से खत्म हो जाती हैं। शोध पत्रिका 'लांसेट प्लानेटरी हेल्थ' के एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में बढ़ते एयर पॉल्यूशन के कारण मिसकैरेज का खतरा सात फीसद तक बढ़ जाता है, जोकि भारत और पाकिस्तान में ज्यादा है।
मिसकैरेज के लक्षण

  • ब्लीडिंग
  • स्पॉटिंग
  • पेट और कमर में दर्द
  • खून के साथ टिश्यू निकलना

बता दें, प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लीडिंग या स्पॉटिंग के बाद मिसकैरेज होना जरुरी नहीं है। लेकिन ऐसा होने के बाद सतर्क रहने की जरूरत है।

मिसकैरेज की वजह
थायरॉयड- प्रेग्नेंसी में थायरॉयड होने पर बहुत सतर्क रहने की जरूरत होती है, क्योंकि ये कई बार मिसकैरेज की वजह बन जाता है।
डायबिटीज - इस दौरान तमाम महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाती है। ऐसे में समय समय पर डॉक्टर से जांच कराना जरुरी है।
फाइब्रॉयड्स- यूटरिन फाइब्रॉयड, इम्यून डिसऑर्डर भी कई बार मिसकैरेज का कारण बन जाते हैं।
क्रोमोसोमल असामान्यता और हार्मोनल असंतुलन- भ्रूण को गलत संख्‍या में क्रोमोजोम मिलने के कारण भी मिसकैरेज के चांस बढ़ जाते हैं। वहीं, समय रहते हार्मोनल असंतुलन की स्थिति को दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है।
मिसकैरेज से रिलेशनशिप पर असर
शोध की मानें तो मिसकैरेज के बाद कपल्स के रिश्ते पर असर पड़ सकता है। ये उनके अलग होने की वजह भी बन सकता है और करीब भी ला सकता है। ये सब इस बात पर डिपेंड करता है कि वे कैसे एक-दूसरे को संभालते हैं। साइकॉलोजिस्ट डॉ. नेहा गर्ग बताती हैं कि किसी महिला को अचानक जब पता चले कि उनके गर्भ में पल रहा बच्चा दुनिया में आने से पहले ही चल बसा तो इस दुख को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल होता है। इसे लेकर कई महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण तीन साल तक दिखाई देते हैं। ऐसे में इस डिप्रेशन से बाहर निकलना बहुत जरूरी है। अगर आप और आपके पार्टनर की मिसकैरेज पर अलग-अलग सोच है, तो आप अपने रिश्ते में अकेला महसूस कर सकते हैं। यहां तक​ कि ये सोचने लग जाते हैं कि क्या आपको एक साथ होना चाहिए। ऐसे में ये जरुर याद रखें कि मिसकैरेज किसी भी महिला के साथ हो सकता है। एक दूसरे को समझना जरुरी है।

मिसकैरेज के बाद कपल्स रिश्ते को ऐसे संभालें

  • अपनी फीलिंग शेयर करें- मिसकैरेज के बाद कपल्स के अनुभवों को लेकर अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं के पार्टनर फीलिंग और अनुभवों को एक दूसरे से साझा करते हैं वे पर्सनली और फिजिकली उनके करीब महसूस करती हैं। दुख बांटने के अनुभव उन्हें ज्यादा पास ले आते हैं।
  • एक दूसरे का सहारा बनें- अगर आपको लगता है कि आपका पार्टनर पूरी तरह से ठीक है तो इसका मतलब ये न समझें कि उसे दुख नहीं है। हमेशा एक-दूसरे को सपोर्ट करें।
  • मिसकैरेज होना किसी की गलती नहीं है। एक-दूसरे पर दोष डालने से कपल्स के बीच केवल दरार पैदा होती है इसलिए दोष देने से बचें।
  • ऐसे कपल्स से बात करें, जो मिसकैरेज का दर्द झेल चुके हैं। अगर फिर भी डिप्रेशन महसूस करते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लें सकते हैं।

महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान

  • मिसकैरेज के बाद शरीर में खून की कमी हो जाती है, इसलिए आयरन और विटामिन युक्त फलों और सब्जियों का सेवन जरूरी है।
  • कम से कम दो सप्ताह तक आराम करें।
  • भोजन में दाल, दूध और पनीर जैसी प्रोटीन और कैल्शियम वाली चीजों की मात्रा बढ़ा दें।
  • प्रेग्नेंसी के बारे में पढ़ें। डॉक्टरों और पहले मां बन चुकी महिलाओं से बात करें।

मिसकैरेज के बाद कब हो दूसरी प्रेग्नेंसी
मिसकैरेज और दूसरी प्रेग्नेंसी में कम से कम तीन या चार महीने का अंतर रखने की सलाह दी जाती है। इससे पहले कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अगर कपल्स दोनों में से किसी एक को भी एल्कोहॉल या स्मोकिंग की आदत है तो इससे दूर रहें। इससे मिसकैरेज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कंसीव करने से पहले आरएच फैक्टर, ब्लड शुगर, थायरॉयड, हेपेटाइटिस की जांच करवा लें। जंक फूड से दूर रहें। प्रेग्नेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद गायनेकोलॉजिस्ट से संपर्क करें। सभी गाइडलाइन का पालन करते हुए अपनी प्रेग्नेंसी को स्वस्थ और खुशनुमा बनाएं।
ये बॉलीवुड एक्ट्रेसेस झेल चुकी हैं मिसकैरेज का दर्द

  • शिल्पा शेट्टी​​​
  • काजोल
  • कश्मीरा शाह
  • सायरा बानो
  • गौरी खान
  • रश्मि देसाई​​​​

एक्टिव गर्ल्स की पर्सनल ब्यूटी गाइड

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

एक्टिव गर्ल्स की पर्सनल ब्यूटी गाइड

आप जिम जाती हैं? वेटलिफ्ट, स्विमिंग, रनिंग या फिर जॉगिंग जैसा वर्कआउट करती हैं? फिजिकल फिटनेस का खयाल रखती हैं?

वर्कआउट करने पर सनबर्न, टैनिंग, बेजान बाल, ऑयली, रूखी स्किन की रेडनेस या स्कैल्प में इचिंग जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। हमने बात की एक्सपर्ट्स से और जाना की एक्टिव वुमेन, आमतौर पर ऐसी किन और परेशानियों का सामना करती हैं साथ ही किस तरह इनसे आसानी से निपटा जा सकता है।

बॉडी ब्रेकआउट

पीठ, हिप्स या सीने पर होने वाले एक्ने ऐसी समस्या है जो स्किन की सही सफाई नहीं करने और औरतों में होने वाले तमाम हार्मोनल बदलाव के कारण होती है। यह एक तरह का फंगल इन्फेक्शन है जिससे बचने के लिए बॉडी को साफ़ सुथरा रखना चाहिए। नहाने से पहले सरसों के तेल की मालिश और नहाते हुए स्क्रब का इस्तेमाल, आपको इस समस्या से दूर रखेगा।

ब्रूज्ड टोनेल-

क्या आपके पैरों के अंगूठे के नाखून में इनग्रोथ है यानी नाखून स्किन के अन्दर घुस कर चुभता और दर्द करता है? यह ब्रूज्ड टोनेल या जॉगर्स टो है, जो एक आम समस्या है।

ब्यूटी एक्सपर्ट सुवर्णा त्रिपाठी बताती हैं कि इसके कारण रनिंग या जॉगिंग के दौरान जूते पहनने पर नाखून आपके पैर के आसपास की स्किन में घुस जाते हैं। आपको भी यह परेशानी है तो ध्यान रखिए कि आपके पैर के नाखून हमेशा छोटे हों। ऐसी दिक्कत आए तो आप पैडीक्योर की दो से तीन सिटिंग लेकर आसानी से इससे निजात पा सकते हैं।

ऑयली या ड्राई स्कैल्प और हेयर फॉल

फिजिकल एक्टिवीज करते हुए बालों को पोनी टेल में बाँध कर रखा जाता है। जिसके कारण स्कैल्प पर पसीना काफी देर तक रह जाता है। स्वेटिंग के कारण स्कैल्प में ड्राईनेस या इचिंग जैसी दिक्कतें आती हैं जिनसे आपके बालों को नुकसान पहुंचता है। इससे बचने के लिए आप जब भी फिजीकल एक्टिविटी करके लौटें तो गुनगुने पानी से शॉवर ज़रूर लें। नहाने से पहले बालों में की गई ऑयलिंग स्कैल्प और बालों को ड्राई नहीं होने देती। अपना शैम्पू चुनते हुए ध्यान रखें कि उसमें सल्फेट या पैराफिन जैसे कैमिकल ना हों। फिर भी अगर यह समस्या आ रही है तो आप हेयरफौल ट्रीटमेंट की पावर डोज ले सकती है जो इस समस्या का कारगर उपाय है।

एथलीट फुट

नाम से कहीं आपने इसे किसी एथलीट का फुट तो नहीं समझ लिया? दरअसल स्किन पर होने वाली रैशेज़, रेडनेस, खुजली और जलन की दिक्कतों को एथलीट फुट के नाम से जाना जाता है।

ब्यूटी एक्सपर्ट पूनम झा बताती हैं कि यह परेशानी वर्कआउट करने वाली महिलाओं में होने की सबसे बड़ी वजह है स्वेटिंग के बाद बॉडी को सलीके से साफ नहीं किया जाना आमतौर पर लोग या तो पसीना सुखा लेते हैं या पसीना पोंछ कर कपड़े बदल लेते हैं। इससे बचने का आसान तरीका है कि एक्सरसाइज़ के बाद आप गुनगुने पानी से जरूर नहाएं। बॉडी के जिन हिस्सों पर स्वेटिंग होती है उनपर पाउडर लगाएं और सोने से पहले उसे साफ जरूर करें। अगर यह दिक्कत बनी रहे तो उस जगह पर हर्बल क्रीम या प्योर नारियल का तेल लगा कर रखें ताकि उस जगह की नमी ख़त्म होने के कारण वहां खुजली न हो।

नरेंद्र गिरि के निधन पर शोक की लहर

भारत डाॅट समाचार टाइम्स

लखनऊ।

प्रयागराज में भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का सोमवार यानी आज संदिग्ध हालात में निधन हो गया। महंत के निधन की खबर मिलते ही मठ पर बड़ी संख्या में भक्त और श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं। उधर, राजनीतिक दलों में भी शोक की लहर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह समेत विभिन्न राजनीतिक दलों और संत-महात्माओं ने इस दुखद घटना पर शोक संवेदनाएं व्यक्त की हैं।

PM ने कहा- श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री नरेंद्र गिरि जी का देहावसान अत्यंत दुखद है। आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति समर्पित रहते हुए उन्होंने संत समाज की अनेक धाराओं को एक साथ जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। प्रभु उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें। ॐ शांति!!

आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति : योगी आदित्यनाथ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा- अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि जी का ब्रह्मलीन होना आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति है। प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और शोकाकुल अनुयायियों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति!'

नरेंद्र गिरि जी का निधन अपूरणीय क्षति : अखिलेश यादव
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शोक व्यक्त करते हुए ट्वीट कर कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पूज्य नरेंद्र गिरी जी का निधन अपूरणीय क्षति है। ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे व उनके अनुयायियों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। भावभीनी श्रद्धांजलि।

स्तब्ध हूं, निशब्द हूं आहत हूं : केशव मौर्य
उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा- मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि पूज्य महंत नरेंद्र गिरि जी महाराज ने खुदकुशी की होगी। स्तब्ध हूं, निशब्द हूं आहत हूं। मैं बचपन से उन्हें जानता था, साहस की प्रतिमूर्ति थे। मैंने कल ही सुबह 19 सितंबर को आशीर्वाद प्राप्त किया था। उस समय वह बहुत सामान्य थे बहुत ही दुखद असहनीय समाचार है!

पूज्य महाराज जी ने देश धर्म संस्कृति के लिए जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता है। अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। भगवान से प्रार्थना है कि सभी भक्तों व शिष्यों को दुख सहने की शक्ति दें। भगवान पुण्यात्मा को चरणों में स्थान दें।

शिवराज चौहान ने कहा- योगदान हमेशा याद किया जाएगा
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट करते हुए लिखा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पूज्य संत महंत नरेंद्र गिरी जी महाराज के देवलोक गमन की दुखद सूचना मिली। सनातन धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले पूज्य स्वामीजी द्वारा समाज के कल्याण में दिए योगदान को सदैव याद किया जाएगा। ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे: बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा
बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत श्री नरेंद्र गिरी जी महाराज के देवलोक गमन की सूचना सुनकर मन स्तब्ध है। उनका निधन धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति..


Sunday, September 12, 2021

राधा तुम कभी रुक्मणि न बन पाओगी - सीमा मोटवानी

रचनाकार - सीमा मोटवानी फैज़ाबाद

राधा तुम कभी रुक्मणि न बन पाओगी,,

प्रेयसी तो हो जाओगी पर पत्नी न कहलाओगी...!!


प्रेम नाम तुमने ख़ुद साथ ही छल किया,,

कृष्ण संग चल, जग भय तज दिया,,

कृष्ण बांसुरी हो जाओगी,, पर संग न रह पाओगी,,

राधा तुम रुक्मिणी न बन पाओगी..!!


राधे-कृष्ण से जग सदा बुलाता रहे तो क्या,,!!

प्रेम प्रतिमाएं तुम्हारी लगाता रहे तो क्या,,!!

कृष्ण सिंदूर से कभी अपनी मांग न सज पाओगी,,!!

राधा तुम कभी रुक्मिणी न बन पाओगी,,!!


पुरूष प्रेम तो अस्थिर है युगों से,,

तुम्हारे बन्धन मर्यादित है तभी से,,

कृष्ण चाह मीरा भांति तुम विष भी न पी पाओगी..!!

राधा तुम अमर तो हो जाओगी,,

पर रुक्मिणी न बन पाओगी,,तुम रुक्मिणी न बन पाओगी.....!!

Wednesday, July 8, 2020

यहां लगता है भूतों का मेला!

 आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)


भारत मेलों का देश भी है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में हर वर्ष हजारों की संख्या में मेले लगते है। आपने भी कई मेलों की सैर की होगी। लेकिन क्या आपने कभी भूतों के मेले के बारे में सुना है? भले ही लोग इसे अंधविश्वास कहें, लेकिन बैतूल जिले से करीब 42 किलोमीटर दूर चिचौली तहसील के गांव मलाजपुर में हर वर्ष मकर संक्रांति की पहली पूर्णिमा से ‘भूतों का मेला’ शुरू होता है। यह मेला एक माह चलता है। ऐसी मान्यता है कि 1770 में गुरु साहब बाबा नाम के एक संत ने यहां जीवित समाधि ली थी। कहा जाता है कि संत चमत्कारी थे और भूत-प्रेत को वश में कर लेते थे। उन्ही की याद में हर वर्ष यहाँ मेला लगता है।

मेले में आने वाले भूत-प्रेत के साये से प्रभावित लोग समाधि स्थल की उल्टी परिक्रमा लगाते हैं। कई बार इस मेले को लेकर विवाद हुए। इसे अंधविश्वास के चलते बंद कराने के प्रयास भी किए गये, किन्तु ऐसा नहीं हो सका। इस मेले में देश के कई क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं। इनमें ग्रामीणों की संख्या बहुत अधिक होती है। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के कई आदिवासियों खासकर गोंड, भील एवं कोरकू जनजातियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से टोटका, झाड़ फूंक एवं भूतप्रेत-चुड़ैल सहित अनेक ऐसे रीति-रिवाज निवारण प्रक्रिया चली आ रही है। बैतूल आदिवासी बाहुल्य जनपद है। मान्यता है कि पीड़ित लोग जब यहां लगे झंडे की परिक्रमा करते हैं, तो बुरी छाया समीप के बरगद पर जाकर बैठ जाती है।

यहां आकर आप कई ऐसे दृष्य देखेंगे जिसे देखकर आप सोच में पड़ जायेंगे। किसी के हाथ में जंजीर बंधी है, तो किसी के पैरों में बेडियां है। कोई नाच रहा है, तो कोई सीटियां बजाते हुए चिढ़ा रहा है। लोग कहते हैं कि ये वे लोग है, जिन पर ‘भूत’ सवार हैं। लोग भले ही यकीन न करें, लेकिन यह सच है कि मेले में भूत-प्रेतों के अस्तित्व और उनके असर को खत्म करने का दावा किया जाता है। यहां के पुजारी लालजी यादव बुरी छाया से पीड़ित लोगों के बाल पकड़कर जोर से खींचते हैं। पुजारी कई बार झाड़ा भी लगाते हैं। यहां लंबी कतार में खड़े होकर लोग सिर से भूत-प्रेत का साया हटवाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते देखे जा सकते हैं।

एक मान्यता है कि जो पीड़ित ठीक हो जाते हैं, उसे यहां गुड़ से तौला जाता है। यहां हर वर्ष टनों गुड़ इकट्ठा हो जाता है, जो यहां आने वाले लोगों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। कहा जाता है कि यहां इतनी मात्रा में गुड़ जमा होने के बाद भी यहां मक्खियां या चीटिंयां नहीं दिखाई देतीं। लोग इसे गुरु साहब बाबा का चमत्कार मानते हैं।

यहां आकर लोग पहले स्नान करते हैं उसके बाद समाधि परिक्रमा। यहां मान्यता है कि प्रेत बाधा का शिकार व्यक्ति जैसे-जैसे परिक्रमा करता है, वैसे-वैसे वह ठीक होता जाता है। रोज यहां सायं आरती होती है। इस आरती की विशेषता यह है कि दरबार के कुत्ते भी आरती में शामिल होकर शंख, करतल ध्वनि में अपनी आवाज मिलाते है। इस पर महंत कहते है कि यह बाबा का आशीष है। इस मेले में श्रद्धालुओं के रूकने की व्यवस्था जनपद पंचायत चिचोली तथा महंत करते हैं। 

ऐसी धारणा है कि जिस भी प्रेत बाधा से पीड़ित व्यक्ति को छोडने के बाद उसके शरीर में समाहित प्रेत बाबा की समाधि के एक दो चक्कर लगाने के बाद अपने आप उसके शरीर से निकल कर पास के बरगद के पेड़ पर उल्टा लटक जाता है।  बाद में उसकी आत्मा को शांति मिल जाती है।

जो जानकारी हमें मिल सकी उसके अनुसार इस स्थल का इतिहास यह है कि विक्रम संवत 1700 के पश्चात आज से लगभग 348 वर्ष पूर्व ईसवी सन 1644 के समकालीन समय में गुरू साहब बाबा के पूर्वज मलाजपुर के पास स्थित ग्राम कटकुही में आकर बसे थे। बाबा के वंशज महाराणा प्रताप के शासनकाल में राजस्थान के आदमपुर नगर के निवासी थे। अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य छिड़े घमसान युद्ध के परिणामस्वरूप भटकते हुये बाबा के वंशज बैतूल जिले के इस क्षेत्र में आकर बस गए। बाबा के परिवार के मुखिया का नाम रायसिंह तथा पत्नी का नाम चंद्रकुंवर बाई था जो बंजारा जाति के कुशवाहा वंश के थे। इनके चार पुत्र क्रमशः मोतीसिंह, दमनसिंह, देवजी (गुरूसाहब) और हरिदास थे।

श्री देवजी संत (गुरू साहब बाबा) का जन्म विक्रम संवत 1727 फाल्गुन सुदी पूर्णिमा को कटकुही ग्राम में हुआ था। इनका खाने पीने का ढंग और रहन-सहन का तरीका बड़ा अजीबो-गरीब था। बहुत छोटी अवस्था से ही भगवान भक्ति में लीन श्री गुरू साहेब बाबा ने मध्यप्रदेश के हरदा जिले के अंतर्गत ग्राम खिड़किया के संत जयंता बाबा से गुरूमंत्र की दीक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात तीर्थाटन करते हुये अमृतसर में अपने ईष्टदेव की पूजा आराधना में कुछ दिनों तक रहें इस स्थान पर गुरू साहेब बाबा को ‘देवला बाबा’ के नाम से लोग जानते हैं। बाबा यहां से कुछ दिनों के लिये भगवान शिव की की पुण्य नगरी काशी प्रवास पर गये, जहां गायघाट के समीप निर्मित दरभंगा नरेश की कोठी के पास बाबा का मंदिर स्थित है।

बाबा की समाधि स्थल पर देख-रेख हेतु पारिवारिक परंपरा के अनुरूप बाबा के उतराधिकारी के रूप में उनके बड़े भाई महंत गप्पादास गुरू गद्दी के महंत हुये। इनके बाद यह भार उनके सुपुत्र परमसुख ने संभाला उनके पश्चात क्रमशः सूरतसिंह, नीलकंठ महंत हुये। उसके बाद 1967 में चन्द्रसिंह महंत हुये। इनकी समाधि भी यही पर निर्मित है। यहां पर विशेष उल्लेखनीय यह है कि वर्तमान महंत को छोड़कर शेष पूर्व में सभी बाबा के उत्तराधिकारियों ने बाबा का अनुसरण करते हुये जीवित समाधियाँ ली।

इसमें सबसे बड़ी विचित्रता यह है कि बाबा के भक्तों का अग्नि संस्कार नहीं होता है। बाबा के एक अनुयायी के अनुसार आज भी बाबा के समाधि वाले इस गांव मलाजपुर में रहने वाले किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके शव को जलाया नहीं जाता है चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों ना हो। इस गांव के सभी मरने वालों को उन्हीं के खेत या अन्य स्थान पर समाधि दी जाती है।

इस पर कई साइकोलॉजिस्ट भूत-प्रेत के अस्तित्व को सिरे से खारिज करते हैं। उनके अनुसार मेले में आने वाले लोग निश्चित ही किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं। उनकी परेशानी मानसिक भी हो सकती है और शारीरिक भी। मानसिक रोग से ग्रस्त परिजनों को लोग यहां ले आते हैं। दरअसल किसी भी रोग के इलाज में विश्वास महत्वपूर्ण होता है। इलाज पर विश्वास होता है तो फायदा भी जल्दी मिलता है। हालांकि यह विषय बहुत ही गूढ है। आसानी से समझ में नहीं आता। कुछ लोग इस पर विश्वास करते हैं कुछ लोग नहीं। लेकिन एैसी घटनायें होती है। इन घटनाओं का जिक्र आप समाचार पत्रों में पढ़ सकते हैं। 

इस संवत्सर पड़ेंगे पांच ग्रहण

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
(वरिष्ठ सम्पादक- इडेविन टाइम्स)
मानव सेवा रत्न से सम्मानित

सूर्य संपूर्ण जगत की आत्मा का कारक ग्रह है। संपूर्ण चराचर जगत को ऊर्जा प्रदान करता है सूर्य। अतः बिना सूर्य के जीवन की कल्पना करना असंभव है। चंद्रमा पृथ्वी का प्रकृति प्रदत्त उपग्रह है। यह स्वयं सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होकर भी पृथ्वी को अपने शीतल प्रकाश से शीतलता देता है। यह मानव के मन मस्तिष्क का कारक व नियंत्रणकर्ता भी है। कह सकते हैं कि सूर्य ऊर्जा व चंद्रमा मन का कारक है। ग्रहण एक खगोलीय घटना है। जब एक खगोलीय पिंड पर दूसरे खगोलीय पिंड की छाया पड़ती है, तब ग्रहण होता है। जब पृथ्वी पर चन्द्रमा की छाया पड़ती है तब सूर्य ग्रहण होता है। जब पृथ्वी सूर्य तथा चन्द्रमा के बीच आती है, तब चन्द्रग्रहण होता है।  
राहु-केतु इन्हीं सूर्य व चंद्र मार्गों के कटान के प्रतिच्छेदन बिंदु हैं जिनके कारण सूर्य व चंद्रमा की मूल प्रकृति, गुण, स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है। यही कारण है कि राहु-केतु को हमारे कई पौराणिक शास्त्रों में विशेष स्थान प्रदान किया गया है। राहु की छाया को ही केतु की संज्ञा दी गई है। राहु जिस राशि में होता है उसके ठीक सातवीं राशि में उसी अंशात्मक स्थिति पर केतु होता है। मूलतः राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा की कक्षाओं के संपात बिंदु हैं जिन्हें खगोलशास्त्र में चंद्रपात कहा जाता है।

ज्योतिष के खगोल शास्त्र के अनुसार राहु-केतु खगोलीय बिंदु हैं जो चंद्र के पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने से बनते हैं। राहू-केतू द्वारा बनने वाले खगोलीय बिंदु गणित के आधार पर बनते हैं तथा इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। अतः ये छाया ग्रह कहलाते हैं। छाया ग्रह का अर्थ किसी ग्रह की छाया से नहीं है अपितु ज्योतिष में वे सब बिंदु जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन ज्योतिषीय महत्व है, छाया ग्रह कहलाते हैं जैसे गुलिक, मांदी, यम, काल, मृत्यु, यमघंटक, धूम आदि। ये सभी छाया ग्रह की श्रेणी में आते हैं और इनकी गणना सूर्य व लग्न की गणना पर आधारित होती है। ज्योतिष में छाया ग्रह का महत्व अत्यधिक हो जाता है क्योंकि ये ग्रह अर्थात बिंदु मनुष्य के जीवन पर विषेष प्रभाव डालते हैं। राहु-केतु का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं बल्कि संपूर्ण भूमंडल पर होता है। जब भी राहु या केतु के साथ सूर्य और चंद्र आ जाते हैं तो ग्रहण योग बनता है। ग्रहण के समय पूरी पृथ्वी पर कुछ अंधेरा छा जाता है एवं समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं।

इस संवत्सर में कुल 5 ग्रहण लगेंगे। जिसमें से 3 मांद्य चन्द्र ग्रहण होंगे एवं 2 सूर्य ग्रहण। 
1. चन्द्रग्रहण- यह ग्रहण 5 जून को पड़ चुका है। ये छाया चन्द्रग्रहण था।  
2. खण्ड सूर्यग्रहण- यह ग्रहण भी 21 जून को पड़ चुका है। यह भारत में दिखायी दिया था। 
3. छाया चन्द्रग्रहण- यह ग्रहण 5 जुलाई को पड़ चुका है। इसका कोई भी धर्मशास्त्रीय महत्व नहीं था। 
4. छाया चन्द्रग्रहण- कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा सोमवार 30 नवम्बर 2020 को पुनः एक छाया चन्द्रग्रहण लगेगा। इसका कोई भी धर्मशास्त्रीय महत्व नहीं है। स्मरण रखने की बात है कि चन्द्रमा पृथ्वी की धूसर छाया में से होकर गुजरता है तो इस तरह की परिस्थिति बनती है। इसे मांद्य चन्द्रग्रहण भी कहते हैं।
5. खग्रास सूर्यग्रहण- मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या सोमवार 14 दिसम्बर 2020 को खग्रास सूर्य ग्रहण लगेगा। किन्तु यह सूर्य ग्रहण भारत में बिल्कुल भी दिखायी नहीं देगा। इसका कोई धर्मशास्त्रीय प्रभाव नहीं है। 

सूतक 
सूर्यग्रहण का सूतक स्पर्श समय से 12 घंटे पूर्व प्रारम्भ हो जाता है। चन्द्र ग्रहण का 9 घंटे पूर्व से। स्पर्श के समय स्नान पुनः मोक्ष के समय स्नान करना चाहिये। सूतक लग जाने पर मन्दिर में प्रवेश करना मूर्ति को स्पर्श करना, भोजन करना, मैथुन क्रिया, यात्रा आदि वर्जित है। बालक, वृद्ध, रोगी अधिक आवश्यकता होने पर पथ्याहार ले सकते हैं। भोजन सामग्री जैसे दूध, दही, घी इत्यादि में कुश रख देना चाहिये। ग्रहण मोक्ष के बाद पीने का पानी ताजा ले लेना चाहिये। गर्भवती महिलायें पेट पर गाय के गोबर का पतला लेप लगा लें। गहण अवधि में श्राद्ध, दान, जप, मंत्र सिद्धि आदि का शास्त्रोक्त विधान है। ग्रहण जहां दिखायी देता है सूतक भी वहीं लगता है एवं धर्मशास्त्रीय मान्यतायें भी लागू होती हैं तथा उसका फलाफल भी वहीं लागू होगा। 

ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से सूर्य ग्रहण
प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है ग्रहण। ज्योतिष के दृष्टिकोण से यदि देखें तो अभूतपूर्व अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान, ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियाँ एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। सूर्य ग्रहण (सूर्योपराग) तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृ्त (व्यवधान/बाधा) हो जाये। इस प्रकार के ग्रहण के लिये चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृ्थ्वी पर रहने वालों को सूर्य का आवृ्त भाग नहीं दिखाई देता।

    सूर्यग्रहण होने के लिए निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है।
    अमावस्या होनी चाहिये।
    चन्द्रमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिये।
    चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिये।
उत्तरी धु्रव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली रेखाओं को रेखांश कहा जाता है। भूमध्य रेखा के चारो वृ्ताकार में जाने वाली रेखाओं को अंक्षाश कहा जाता है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हों। चन्द्र और राहू या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिये। चन्द्र का अक्षांश लगभग शून्य होना चाहिये। यह तब होगा जब चंद्र रविमार्ग पर या रविमार्ग के निकट हों। सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य और चन्द्र के कोणीय व्यास एक समान होते हैं। इस कारण चन्द्र सूर्य को केवल कुछ मिनट तक ही अपनी छाया में ले पाता है। सूर्य ग्रहण के समय जो क्षेत्र ढक जाता है उसे पूर्ण छाया क्षेत्र कहते हैं। चन्द्रमा द्वारा सूर्य के बिम्ब के पूरे या कम भाग के ढ़के जाने के कारण ही सूर्य ग्रहण होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण व वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

 खगोल शास्त्रीयों की गणनायें
खगोल शास्त्रियों नें गणित से निश्चित किया है कि 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं। किन्तु एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण तो होने ही चाहिये। यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुये तो वो दोनो ही सूर्यग्रहण होंगे। यद्यपि वर्षभर में 7 ग्रहण तक संभाव्य हैं, फिर भी 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुनः होता है। किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं हैं, क्योंकि सम्पात बिन्दु निरन्तर चल रहे हैं।

सामान्यतः सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि चन्द्र ग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं। 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात आता है। चन्द्रग्रहणों के अधिक देखे जाने का कारण यह होता है कि वे पृ्थ्वी के आधे से अधिक भाग में दिखलाई पडते हैं, जब कि सूर्यग्रहण पृ्थ्वी के बहुत बडे भाग में प्रायः सौ मील से कम चौडे और दो से तीन हजार मील लम्बे भूभाग में दिखलाई पडते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि मध्यप्रदेश में खग्रास (जो सम्पूर्ण सूर्य बिम्ब को ढकने वाला होता है) ग्रहण हो तो गुजरात में खण्ड सूर्यग्रहण (जो सूर्य बिम्ब के अंश को ही ढंकता है) ही दिखलाई देगा और उत्तर भारत में वो दिखायी ही नहीं देगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण में सूर्य ग्रहण
ग्रहण का समय दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिये भी बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्राह्मंड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनायें घटित होतीं हैं जिससे कि वैज्ञानिकों को नवीन तथ्यों पर कार्य करने का अवसर मिलता है। 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक नें सूर्य ग्रहण पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था। आईन्स्टीन का यह प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही सही सिद्ध हो सका, जिसमें उन्होंने अन्य पिण्डों के गुरुत्वकर्षण से प्रकाश के पड़ने की बात कही थी। चन्द्रग्रहण तो अपने संपूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता है किन्तु सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिकतम 11 मिनट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं। संसार के समस्त पदार्थों की संरचना सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही संभव है। यदि सही प्रकार से सूर्य और उसकी रश्मियों के प्रभावों को समझ लिया जाये तो समस्त धरा पर आश्चर्यजनक परिणाम लाये जा सकते हैं। सूर्य की प्रत्येक रश्मि विशेष अणु का प्रतिनिधित्व करती है और जैसा कि स्पष्ट है, प्रत्येक पदार्थ किसी विशेष परमाणु से ही निर्मित होता है। अब यदि सूर्य की रश्मियों को पूंजीभूत कर एक ही विशेष बिन्दु पर केन्द्रित कर लिया जाये तो पदार्थ परिवर्तन की क्रिया भी संभव हो सकती है।

भारतीय वैदिक काल और सूर्य ग्रहण
वैदिक काल से पूर्व भी खगोलीय संरचना पर आधारित कलैन्डर बनाने की आवश्कता हुई। सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से 400 वर्ष पूर्व ही उपलब्ध थी। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है। ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक, वैदिक, वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आये हैं।

सूर्य ग्रहण के समय हमारे ऋषि-मुनियों के कथन
हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन का निषेध किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणुओं की बहुलता होती है। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिये ऋषियों ने पात्रों में कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जायें। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिये बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जायें और धुल कर बह जायें।

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की संतान हैं। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं। चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिये, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिये गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें। ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कुछ भी कैंची या चाकू से काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलने से रोका जाता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं।

ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिये। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किये गये हैं। कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्मण को दान देने का विधान है। तुलसी का पौधा शास्त्रों के अनुसार पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सक्षम है। इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट आस-पास मौजूद दूषित कणों को मार देते हैं। इसलिये तुलसी को खाद्य पदार्थों में डालने से उस भोजन पर ग्रहण का असर नहीं होता। 
--------

Sunday, July 5, 2020

पक्ष फलादेश- श्रावण कृष्ण पक्ष (6 से 20 जुलाई)

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(वरिष्ठ सम्पादक-इडेविन टाइम्स)
पक्ष के 3 सोमवार एवं सोमवारी अमावस्या से युक्त 15 दिनां का पूर्ण पक्ष अत्यन्त शुभ फलकारक है। 6 जुलाई से ही श्रावण मास का प्रारम्भ हो रहा है। चातुर्मास में किया जाने वाला, अक्षुण दाम्पत्य जीवन की कामना से अशून्य शयन का व्रत चन्द्रोदय व्यापिनी द्वितीया तिथि में पक्षारम्भ 6 जुलाई सोमवार को किया जायेगा। चन्द्रोदय रात 08ः05 बजे चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जायेगा। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत का मान 8 जुलाई बुधवार को होगा। चन्द्रोदय रात 09ः32 बजे चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जायेगा। मध्यान्ह व्यापिनी सप्तमी तिथि में शीतलासप्तमी का मान 12 जुलाई रविवार को होगा एवं आज ही सप्तमी तिथि रविवार के योग में भानु सप्तमी का पर्व मनाया जायेगा। इसमें किये जाने वाला स्नान-दान सूर्य ग्रहण में किये जाने वाला स्नानदान के बराबर फलदायी माना जाता है। कामदा (कामिका) एकादशी व्रत का मान सबके लिये 16 जुलाई गुरूवार को होगा। पुत्र की कामना से शनि प्रदोष का व्रत 18 जुलाई को किया जायेगा। मास शिवरात्रि व्रत का मान भी 18 जुलाई शनिवार को होगा। स्नान दान एवं श्राद्ध सहित श्रावणी अमावस, हरियाली अमावस्या एवं सबसे बढ़कर सोमवती अमावस्या का मान 20 जुलाई सोमवार को है। ‘अश्वत्थ मूले.........’ विहित मंत्र का उच्चारण करते हुये सौभाग्यवती स्त्रियां पति सौख्य वृद्धि की कामना से पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा करेंगीं। माना जाता है कि आज के ही दिन भगवान विष्णु का निवास पीपल वृक्ष की जड़ में हो जाता है। इसी विश्वास के साथ इसको किया जाता है। पुनर्वसू नक्षत्र का सूर्य पक्षारम्भ 6 जुलाई सोमवार को दिन 08ः20 बजे से आयेगा। इसमें सर्वत्र बहुत अच्छी वर्षा के योग मिल रहे हैं। 16 जुलाई गुरूवार को कर्क राशि की सूर्य संक्रान्ति रात 09ः25 बजे से आयेगी और इसी के साथ सूर्य दक्षिण पथगामी (दक्षिणायन) हो जायेगे। इसमें भी सर्वत्र अच्छी वर्षा के योग बन रहे हैं। 10 से 20 जुलाई के बीच में सर्वत्र व्यापक वर्षा की संभावना है।

श्रावण शुक्ल पक्ष (21 जुलाई से 3 अगस्त) का पक्ष फलादेश अगले अंक में पढ़े........................

Sunday, June 21, 2020

परलोक विद्या का रहस्य

 आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
’’मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(पत्रकार एवं आध्यात्मिक लेखक)

कर्मवश जीव स्वर्ग आदि परलोक में जाता है और वहां सुख-दुख का अनुभव करके तब मनुष्यलोक में पुनर्जन्म लेता है। उसमें कारण यह है कि स्वर्ग आदि स्थान भोगस्थान हैं। उनमें इस लोक में किये हुये कर्मों के भोगार्थ जीव जाता है। वहां वह कर्म करने में समर्थ नहीं होता। इसलिये स्वर्ग में गये हुये जीव देवयोनि  बने हुये भोगयोनि ही माने जाते हैं। तब कर्मफल की समाप्ति के थोड़े शेष कर्मों को लिये जीव पुनः कर्म करने के लिये इस लोक में आता है और मनुष्य बनता है। मनुष्य कर्मयोनि माना जाता है। कर्मफल भोगकर स्वर्ग से गिरकर इस लोक में आना भगवद्गीता में भी कहा है- ‘ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।’ (9/21) गीता के ही अध्याय 9 के श्लोक संख्या 21 का आशय भी है कि जीव यज्ञ आदि कर्मों से स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं। वहां देवता बनकर दिव्य भोगों को भोगते हैं। फिर पुण्य के समाप्त हो जाने पर स्वर्ग से गिरकर इस मनुष्यलोक को प्राप्त होते हैं।’ यही बात उपनिषद्ों भी कही है- ‘तद् यथा इस कर्मजितो लोकः क्षीयते, एवमेव अमुत्र (परलोक) पुण्यजितो लोकः (स्वर्ग) क्षीयते। (छान्दोग्य0 8/1/6)। यहां स्वर्ग की क्षीणता का तात्पर्य स्वर्ग से गिरकर फिर मनुष्यलोक में पुनर्जन्म लेने में है। मुण्डकोपनिषद में भी कर्मयोनि मनुष्यों के फलभोग के लिये स्वर्गगमन कहा है। तब वे भोगयोनि देव होकर, कर्म समाप्तप्राय हो जाने पर स्वर्गलोक से गिरकर फिर इस मनुष्यलोक में आ जाते हैं और कर्मयोनि होकर कर्म में प्रवृत्त हो जाते है। महाभारत के वनपर्व (261/42) में भी स्वर्ग और सुख दोनों को भिन्न-भिन्न बताया गया है। अतः स्वर्गलोक इस लोक से भिन्न ही सिद्ध हुआ। अथर्ववेद संहिता में द्युलोक, जिसके पृष्ठपर स्वर्गलोक है, पृथ्वीलोक से भिन्न माना गया है। उसी में देवता रहते हैं। इससे सिद्ध होता है मनुष्य कर्मयोनि है और देवता केवल भोगयोनि। यदि देवता भी कर्मयोनि होते तो उन्हें कर्म करने के लिये फिर इस लोक में आना न पड़ता। 

हिन्दुओं द्वारा मृतकों को श्राद्ध-तर्पण देखकर वैदेशिक वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित हुआ है। उन्होने उसका परीक्षण प्रारम्भ कर दिया। उससे उन्हें प्रतीत हुआ कि मरा हुआ व्यक्ति अभाव को प्राप्त नहीं हो जाता, किन्तु मरने के बाद उसकी स्थिति परलोक में हो जाती है। उत्तम माध्यम द्वारा हम उससे सम्बन्ध करके उससे लाभ ने सकते हैं। सबकी शैलियां भिन्न-भिन्न होती हैं। वैदेशिकों ने मृतकों के आकर्षणार्थ अपने ढंग के उपाय जारी किये। हमारे पूर्वजों ने कुश, मधु, तिल, गंगाजल, तुलसीपत्र, चावलों के पिण्ड आदि का मृतकों के जीव के आकर्षणार्थ उपयोग कर रखा है। इनका भी यन्त्र बनाकर निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिये। हमारे पूर्वजों की प्रायः सभी बातें परीक्षण-निरीक्षण करने पर सत्य सिद्ध हुई हैं। हम स्थूल शरीर होने से सीमित शक्ति वाले हैं, पर मृतक पुरूष स्थूल-शरीर छूट जाने से पारलौकिक दिव्य सूक्ष्म शरीर मिलने से अलौकिक शक्तिशाली होते हैं। उनसे सम्बन्ध स्थापित करके हम उस लोकोत्तर शक्ति का लाभ उठा सकते हैं। घड़े में ढके दीपक की प्रकाशन-शक्ति सीमित होती है। घेड़े से बाहर ठहरे दीपक की प्रकाशन-शक्ति अधिक रहा करती है। हम भी स्थूल शरीराछन्न होने से उस घड़े में रखे दीपक की तरह हैं और परलोक प्राप्त पुरूष उसके अपवाद हैं। आत्मा के न्यायादि शास्त्रसम्मत विभुत्व का वही उपयोग ले सकते हैं। 

उदाहरण के लिये एक व्यक्ति अधिक बीमार है। हम उसका उपचार करके भी उसे स्वस्थ नहीं कर सके। उस समय यदि हम परलोकस्थ आत्मा से सम्बन्ध करके उससे उसकी दवाइयां पूछें, तो अधिक ज्ञानशाली होने से उनसे बतायी गयी दवाइयां सम्भवतः उस बीमार के लिये हितकारक सिद्ध होंगी। इस प्रकार की परलोकस्थ आत्माओं से बतायी गयी दवाइयां प्रायः सफल सिद्ध भी हो चुकी हैं। जब परलोक प्राप्त के हस्ताक्षर मिल जाते हुये देखे गये हैं, उनकी बतायी गुप्तधन गड़ने की बातें मिल गयी हैं, उनके छाया-चित्र गृहीत हो जाते हैं, तो इस विद्या में उन्नति करके हम कई लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस विषय में श्रद्धा करने से ‘श्रद्धया सत्यमाप्यते’। (यजुर्वेद 19/30) ‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् (गीता 4/39) हमें सत्य और ज्ञान की प्राप्ति होगी। हमारे प्राचीन लोग भी मृतक व्यक्ति का परलोक में निवास और उसका आह्वाहन भी मानते थे। लंका विजय के बाद अग्नि-शुद्धि के समय परलोक से आये हुये राजा दशरथ ने भी सीता की शुद्धि में साक्षी दी थी। इस विषय की जानकारी से एक लाभ अवश्य मिलेंगा कि मृत्युभय छूट जायेगा। दूसरा लाभ यह होगा कि हमारा मृतक सम्बन्धी, जिसे हम सदा के लिये बिछुड़ गया समझते है, फिर हम उसे अपने निकट पायेंगे। फिर मृतक का श्राद्ध-तर्पण भी प्रत्यक्षानुगृहीत हो जायेगा। इस परलोकविद्या की उन्नति हो जाने पर हम स्वर्गीय देवताओं से भी वार्तालाप कर सकेंगे। 

धर्मशास्त्रों की कई बातें आज के समय में प्रचलित न होने से अपुपयोगी मालूम पड़ती हैं। पर हमारे ऋषि-मुनि बहुत विद्वान थे। उनकी बातें अब विज्ञान-सिद्ध हो रही हैं। हमारी अपेक्षा पितरों में अधिक शक्ति रहती हैं। उनकी अपेक्षा देवताओं में अधिक शक्ति है। देवता-विषय बहुत जटिल है। आरम्भ में पितृ-विषय भी बहुत जटिल था। पितरों का आह्वाहन तथा आकर्षण एवं उनका यहां आगमन और संवाद तथा उनसे हमारा संरक्षण होता है। यह बात बहुत लोग नहीं मानते थे। इतिहास पुराण में मृतक दशरथ आदि का इस लोक में आने का वर्णन आता है। योगदर्शन के व्यासभाष्य में भी ‘पितृन् अतीतान् अकस्मात् पश्यति।’ (3/22) में भी यह संकेत आया है। अनुसन्धानकर्ताओं ने अपनी खोजों से यह विषय समूल सिद्ध पाया है। बहुत कुछ सफलता भी इस विषय में प्राप्त हो चुकी है। तब आगे अनुसंधाताओं का देवतावाद की तरफ भी ध्यान जायेगा। 

शास्त्रों के अनुसार पितृगण चन्द्रलोक के पृष्ठपर रहते हैं। चन्द्रग्रह की कक्षा सब ग्रहों से नीचे और भूमण्डल के निकट है। तभी भूमण्डल के निवासी उसके साथ के ठहरे चन्द्रलोक के पृष्ठ पर रहने वाले पितरों का यथाशक्ति आह्वाहन या आकर्षण करने में शीघ्र सफल हो गये हैं। वेद में भी ‘आ यन्तु नः पितरः।’ (यजुर्वेद 19/58) इत्यादि मन्त्रों से पितरों का आह्वाहन तथा ‘अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तः।’ से तृप्ति ‘अधि बु्रवन्तु’ से पितरों का हमें उपदेश वा संवाद, ‘ते अवन्तु अस्मान्’ से हमारी पितरों द्वारा ‘पान्ति रक्षन्ति इति पितरः’ इस व्युत्पत्ति से हमारे किसी अस्वस्थ आदि के स्वास्थ्य की, (उत्तम औषधि बताकर) रक्षा करना विदित है। पितरों के आकर्षण पर आर्यसमाजी विद्वान श्रीरघुनन्दन शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वैदिक-सम्पत्ति’ (प्र0सं0 के 371 पृष्ठ पर प्रकाश डाला है। उन्होने लिखा है- प्रश्न यह है कि चन्द्रलोक से जीवों को किस प्रकार खींचा जाये। जीवों के खींचने का वही तरीका है, जो सूर्यकान्तमणि के द्वारा सूर्यताप खींचने में और चन्द्रमान्तमणि के द्वारा चन्द्रजल के खींचने में प्रयोग लाया जाता है। जिस प्रकार से चन्द्रकान्त के प्रयोग से चान्द्रजल की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार चान्द्र-पदार्थों को एकत्रित करने से चान्द्रवीर्य भी आकर्षित होता है। चान्द्रवीर्य में ही जीव रहते हैं, इसलिये उन पदार्थो। में खिंच आते हैं। जो चान्द्राकर्षण के लिये विधि से एकत्रित किये जाते हैं। वे पदार्थ- दूध, घृत, चावल, मधु, तिल, रजतपात्र, कुश (तुलसीदल) और जल हैं। यह प्रक्रिया शरत्पूर्णिमा के दिन लोग करते हैं। परन्तु विधिपूर्वक क्रिया तो पितृश्राद्ध के समय ही होती है। पितृश्राद्ध अपराह्न के समय होता है। उसमें दूध, घृत, मधु, कुश आदि सभी पदार्थ रखे जाते हैं। पितरों का प्रतिनिधि पुत्र अथवा पौत्र भी उन पदार्थों को छूता हुआ वहीं पर बैठता है। इसलिये यह सब हवि आदि सामग्री उसी प्रकार का यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमणि। इसी में पितर खींचकर आते है- ‘परा यात पितरः सोम्यासः।’ (अथर्ववेद 18/4/63)

भूमण्डल (पृथ्वी) के निकट होने से ही वैज्ञानिक भी राकेट आदि से चन्द्रलोक की यात्रा करने का प्रयास करते रहते हैं। पर देवता द्युलोक के अन्य विभागों मे रहा करते हैं। वे पितरों की अपेक्षा हमसे बहुत दूर हैं। हमारा एक मास पितरों का दिन-रात होता है। हमारा एक वर्ष देवताओं का दिन-रात होता है। परन्तु यदि हमारा विज्ञान बढ़ता गया तो हम पितरों की भांति देवताओं के भी निकट हो जायेंगे। कुन्ती को दुर्वासा मुनि से दिये हुये मन्त्रों से सूर्य, यम, वायु, इन्द्र, आश्विनीकुमार जैसे देवता आये थे, यह सर्वविदित है। पौराणिक इतिहास में भी जो देवताओं का भूलोक में आना बताया गया है, वह इसी बात को सिद्ध करता है कि हमारे पूर्वजों को देवताओं को बुलाने की विद्या भी ज्ञात थी। हमारे राजा दशरथ आदि रथों द्वारा देवलोक में भी जाया करते थे। अब यदि प्रयत्न से पितृवाद कुछ सुलझ गया है, तब समय आने पर देवतावाद भी सुलझ पायेगा। 
यजुर्वेद का एक मन्त्र है- 
आयन्तु नः पितरः सोम्यासोअग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोअधिब्रुवन्तु। तेअवन्तु अस्मान्।
(यजुर्वेद-सं0 19/58)
इस मन्त्र से ज्ञात होता है कि पितरों को स्वधा से तृप्त करने का विचार करने से ही हमारे आह्वाहन पर हमारे यहां आते हैं और वे हमसे संवाद करते हैं और हमें उत्तम उपाय बताकर पितृ नाम को (पाति रक्षति इति) सार्थक करते हुये हमारी रक्षा भी करते हैं। इसके लिये माध्यम भी उत्तम होना चाहिये। श्राद्ध भी पूर्व समय में उन्हीं माध्यमों के प्रयोगकर्ता वैज्ञानिक ब्राह्मणों को खिलाया जाता था। श्राद्धविधि के अनुसार सुचरित्र, वेद आदि शास्त्रों का विद्वान, बहुभाषाप्रवीण, पितृकर्मनिष्णात ब्राह्मण माध्यम रखा जाये। इस कर्म में मृतक के पुत्र, पौत्र वा प्रपौत्र का सम्पर्क अवश्य होना चाहिये। उन्हें श्रद्धालु भी होना चाहिये। 

आह्वाहन का समय
पितरांं के आह्वाहन के समय अमावस्या आदि तिथि का नियम, अपराह्नकाल, यज्ञोपवीत के दक्षिण स्कन्ध में करने का नियम, तिल, घृत, मधु, तुलसीदल, गंगाजल युक्त ओदन का तथा रजतपात्र का उपयोग भी शास्त्रानुकूल अनुसृत किया जाना चाहिये। हां, आश्विन के दिनों में मृतक की मृत-तिथि के अनुसार भी पितरों का आह्वाहन हो सकता है, अथवा क्षयाहवाले दिन भी मृतक का आह्वाहन हो सकता है। उसका कारण यह है कि पितृलोक चन्द्रलोक पर है। आश्विन के दिनों में चन्द्रमा अन्य मासों की अपेक्षा पृथ्वी के अधिक निकट होता है, इसलिये उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी तथा उसमें स्थित देहधारियों पर विशेष रूप से पड़ता है। तब चन्द्रलोक स्थित पितरों का भी हमसे सम्बन्ध होकर परस्पर आदान-प्रदान होता है। क्षयाह की तिथि में वे पितर सीधे उसी मार्ग में होते हैं, क्योंकि तिथि चन्द्रगति के अनुसार हुआ करती है और उस स्थिति में पितर उसी मार्ग में हुआ करते हैं, जिस तिथि में वे मृत्यु प्राप्त करके उस स्थान में जाते हैं। 

कृष्णपक्ष में पितरों के आह्वाहन का कारण यह होता है कि उस समय सूर्य उनके निकट होने से वह उनका दिन होता है। अमावस्या उनका मध्यान्ह होती है। जब पितरों का निद्रा समय हो, (शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की सप्तमी तक) उस समय पितरों का आह्वाहन नहीं करना चाहिये। क्योंकि उस समय वे बिना आश्विन मास के अन्य मास में संवाद नहीं करना चाहते। उस समय कई अन्य भूत-प्रेत आदि ही संवाद कर रहे हों, यह सम्भव होता है। तीन पीढ़ी से अधिक के पितरों को भी संवाद के लिये नहीं बुलाना चाहिये, क्योंकि वे उस समय चन्द्रलोक से ऊपर के लोक में चले जाते हैं। पितृकोटि में न रहकर देवकोटि में चले जाते हैं। उन्हें बुलाने के लिये शास्त्रीय अन्य उपाय करने पड़ेगे। कई मृतक तो आरम्भ में ही पितृकोटि में न जाकर परलोक के निम्नस्तर नरक आदि लोकों में अथवा भूत-प्रेत आदि योनि में चले जाते हैं, जहां वे बहुत अशान्त रहेते हैं। हमारे पूर्वज जिस बात को आध्यात्मिक तरीके से तथा मन्त्रशक्ति से करते थे, पाश्चात्य वैज्ञानिक उसी बात को आधिभौतिक प्रकार से तथा यन्त्रशक्ति से करते हैं। पहले प्रकार का अवलम्बन करने पर शास्त्रों पर दृढ़ निष्ठा बनी रहती है, श्रद्धा विश्वास बना रहता है, आस्तिकता बनी रहती है। 

निष्कर्षतः परलोकविद्या है, पुनर्जन्म भी अवश्य है। यह सब सुकर्म-दुष्कर्म के फल हैं। जो इन वादों पर हृदय से आस्था रखते हैं। वे असत्य, कपट,चोरी, ठगी, बेईमानी आदि दुष्कृत्य नहीं करते। पर परलोक से डरने वाले लोग, पुनर्जन्म और परलोक एवं कर्मफल में विश्वास रखने वाले , धर्मपरायण, निर्लोभ, प्रायः निःस्वार्थ, परोपकार-परायण, पुण्यनिरत रहा करते हैं। आजकल कई लोग आडम्बर से तो पुनर्जन्म मानते हैं, पर वेद-शास्त्रआदि में छल, अर्थ का अनर्थ आदि करके, स्वविरूद्ध शास्त्रीय सिद्धान्तों में प्रक्षेप बताकर ऋषि-मुनियों के अनभीष्ट अर्थ करके परमेश्वर या परलोक से डर नहीं रखते, उन्हीं के संज्ञान में लाने हेतु यह लेख लिखा गया है।



Saturday, June 20, 2020

क्या है श्रीमद्भागवत-सप्ताह की विधि ?

आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी
‘‘मानव सेवा रत्न से सम्मानित’’
(पत्रकार एवं आध्यात्मिक लेखक)
श्रीमद्भागवत पुराण हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय व पूज्य ग्रन्थ है। सकाम भक्ति हो या निष्काम योग, नवधा भक्ति हो या ज्ञान साधना, द्वैत भाव हो या अद्वैत के दर्शन सभी मार्गों के रहस्यों को समन्वित करने वाला यह अलौकिक दिव्य ग्रन्थ लौकिक इच्छाओं व पारलौकिक सिद्धियों को प्रदान करने वाला कल्पतरू है। वैष्णव सम्प्रदाय का यह प्रमुख ग्रन्थ है और वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन के गूढ़ व गम्भीर रहस्यभूत विषयों का निरूपण इसमें इतनी सरलता से किया गया है कि इसे भारतीय धर्म व संस्कृति का वस्तुतः विश्वकोष ही कहा जाना चाहिये। वेणु गीतों के माधुर्य के आनन्द का रसास्वाद करना हो या भावपूर्ण गजेन्द्रस्तवन से अश्रु विलगित आंखों व अवरूद्ध कंठ की भावावस्था की अनुभूति करना हो अथवा नारायणकवच के अमोघ पाठ से कलिकाल व दुर्भाग्य से मुक्ति की इच्छा हो, सभी कुछ इस ग्रन्थ में सुलभ है। इसीलिये कहा जाता है कि विद्वानों के ज्ञान की परीक्षा इसी ग्रन्थ से होती है। ‘‘विद्यावतां भागवत् परीक्षा’’। पुटके-पुटके मधु और स्वादु-स्वादु पगे-पगे की भावना इसी ग्रन्थ में अनुभूत होती है। त्रितापों को शान्त करने वाले इस ग्रन्थ में कुल 12 स्कन्ध हैं, जिनमें भगवान विष्णु के 24 अवतारों की कथा का वर्णन है। वर्तमान युग में इसकी प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है। 

पुराणों में श्रीमद्भागवत के सप्ताहपरायण तथा श्रवण की बहुत भारी महिमा वर्णित है। आइये इसी विषय को आगे बढ़ाया जाये-
मुहूर्तविचार- श्रीमद्भागवत प्रारम्भ करने से पहले किसी योग्य ज्योतिर्विद को बुलाकर उनके द्वारा कथा प्रारम्भ के लिये शुभ मुहूर्त का विचार करना चाहिये। नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, आश्विनी, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा तथा पूर्वाभाद्रपदा उत्तम हैं। तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशी को इस कार्य के लिये श्रेष्ठ बतलाया गया है। सोम, बुध, गुरू एवं शुक्र- ये वार सर्वोत्तम हैं। तिथि, वार और नक्षत्र का विचार करने के साथ ही यह भी देख लेना चाहिये कि शुक्र या गुरू अस्त, बाल अथवा वृद्ध न हो। कथा के आरम्भ का मुहूर्त भद्रा आदि दोषों से रहित होना चाहिये। उस दिन पृथ्वी जागती हो, वक्ता और श्रोता का चन्द्रबल ठीक हो। लग्न में शुभ ग्रहों का योग अथवा उनकी दृष्टि हो। शुभ ग्रहों की स्थिति केन्द्र या त्रिकोण में हो तो शुभ है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक और मार्गशीर्ष (अगहन) ये मास कथा के लिये श्रेष्ठ बताये गये है। कुछ विद्वानों के मत से चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मास ग्राह्य हैं। 

कथा के लिये स्थान- भागवत सप्ताह कथा के लिये उत्तम एवं पवित्र स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिये। जहां अधिक लोग सुविधापूर्वक बैठ सकें, ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिये। नदी का तट, उपवन (बगीचा), देवमन्दिर या अपना निवास स्थान ये सभी कथा के लिये उपयोगी स्थल माने गये हैं। स्थान लिपा-पुता स्वच्छ हो। नीचे की भुमि गोबर और पीली मिट्टी से लीपी गयी हो। अथवा पक्का आंगन हो तो उसे धो दिया गया हो। उसपर पवित्र एवं सुन्दर आसन बिछाया गया हो। ऊपर से चंदोवा तना हो। चंदोवा आदि किसी भी कार्य में नीले रंग के वस्त्र का उपयोग न किया जाये। यजमान के हाथ से 16 हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा कथा-मण्डप बनाया जाये। उसे केले के खम्भों से सजाया जाये। हरे बांस के खम्भे लगाये जायें। नये पल्लवों की बंदनवारों, पुष्पमालाओं और ध्वजा-पताकाओं से मण्डप को भलीभांति सुसज्जित किया जाये। उस पर ऊपर से चंदोवा तान दिया जाये। उस मण्डप के दक्षिण-पश्चिम भाग में कथावाचक और मुख्य श्रोता के बैठने के लिये स्थान हो। शेष भाग में देवताओं और कलश आदि का स्थापन किया जाये। कथावाचक के बैठने के लिये ऊंची चौकी रखी जाये। उस पर शुद्ध आसन (नया गद्दा) बिछाया जाये। पीछे तथा पार्श्वभाग में मसनद एवं तकिये रखे जायें। श्रीमद्भागवत को स्थापित करने के लिये एक स्वर्णमण्डित छोटी से चौकी या आधार पीठ बनवाकर (इस चौकी पर तीन तोला सोना मढ़ा होना चाहिये। इतनी शक्ति न हो तो अपनी शक्ति के अनुसार ही यह स्वर्णसिंहासन बनवाये, परन्तु शक्ति होते हुये लोभवश संकोच न करें) उस पर पवित्र वस्त्र बिछा दें। उस पर आगे बताई जाने वाली विधि के अनुसार अष्टदल कमल बनाकर पूजन करके श्रीमद्भागवत की पुस्तक स्थापित की जाये। कथावाचक विद्वान, सर्वशास्त्रकुशल, दृष्टान्त देकर श्रोताओं को समझाने में समर्थ, सदाचारी एवं सद्गुणसम्पन्न ब्राह्मण हों। उनमें सुशीलता, कुलीनता, गम्भीरता तथा श्रीकृष्ण-भक्ति का होना भी परमावश्यक है। वक्ता को असूया तथा परनिन्दा आदि दोष से सर्वथा रहित होना चाहिए। श्रीमद्भागवत की पुस्तक रेशमी वस्त्र से आच्छादित करके छत्र-चंवर के साथ डोली में अथवा अपने मस्तक पर रखकर कथामण्डप में लाना और स्थापित करना चाहिये। उस समय गीत वाद्य आदि के द्वारा उत्सव मनाना चाहिये। कथामण्डप से अनुपयोगी वस्तुएं हटा देनी चाहिए। इधर-उधर दीवालों में भगवान और उनकी लीलाओं के स्मारक चित्र लगा देने चाहिए। वक्त का मुख यदि उत्तर की ओर हो तो मुख्य श्राता का मुख पूर्व की ओर होना चाहिए। यदि वक्ता पूर्वाभिमुख हो तो श्रोता को उत्तराभिमुख होना चाहिये। 

स्मरण रहे सप्ताह कथा एक महान यज्ञ है। इसे सम्पन्न करने के लिये मित्र व अन्य सम्बन्धियों को भी सहायक बनाना चाहिए। अर्थ की व्यवस्था पहले से कर लेना उचित है। दूर से आये हुये अतिथियों के लिये ठहरने की व्यवस्था होनी चाहिए। वक्ता को व्रत ग्रहण करने के लिये एक दिन पहले ही क्षौर करा लेना चाहिये। सप्ताह-प्रारम्भ होने के एक दिन पूर्व ही देवस्थापन, पूजन आदि कर लेना सही है। वक्ता प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व ही स्नान आदि करके संक्षेप से सन्ध्या-वन्दन आदि का नियम पूरा कर ले और कथा में कोई विघ्न न आये, इसके लिये नित्यप्रति गणेशजी का पूजन कर लिया करें। 

सप्ताह के प्रथम दिन यजमान स्नान आदि से शुद्ध होकर नित्यकर्म करके आभ्युदयिक श्राद्ध करे। आभ्युदयिक श्राद्ध पहले भी किया जा सकता है। यज्ञ में 21 दिन पहले भी आभ्युदयिक श्राद्ध करने का विधान है। उसके बाद गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओं सहित नवग्रह, षोडश मातृका, सप्त चिरजीवी (अश्वत्थामा , बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य तथा परशुरामजी) एवं कलश की स्थापना तथा पूजा करें। एक चौकी पर सर्वतोभद्र-मण्डल बनाकर उसके मध्यभाग में ताम्रकलश स्थापित करें। कलश के उपर भगवान लक्ष्मी-नारायण की स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित करें। कलश के बगल में ही भगवान शालग्राम का सिंहासन विराजमान कर देना चाहिये। सर्वतोभद्र-मण्डल में स्थित समस्त देवताओं का पूजन करने के बाद भगवान नर-नरायण, गुरू, वायु, सरस्वती, शेष, सनकादि कुमार, सांख्यायन, पराशर, बृहस्पति, मैत्रेय तथा उद्धव का भी आवाहन, स्थापन एवं पूजन करना चाहिए। फिर त्रय्यारूण आदि 6 पौराणिकों को भी स्थापन-पूजन करके एक अलग पीठ पर उसे सुन्दर वस्त्र से आवृत्त करके, नारदजी की स्थापना एवं अर्चना करनी चाहिए। इसके बाद आधारपीठ, पुस्तक एवं व्यास (वक्ता आचार्य) का भी यथाप्राप्त उपयारों से पूजन करना चाहिए। कथा निर्विघ्न पूर्ण हो इसके लिये गणेश-मन्त्र, द्वादशाक्षर-मन्त्र तथा गायत्री-मन्त्र का जप और विष्णुसहस्त्रनाम एवं गीता का पाठ करने के लिये अपनी शक्ति के अनुसार 7, 5 या 3 ब्राह्मणों का वरण करें। श्रीमद्भागवत का भी एक पाठ अलग ब्राह्मण द्वारा करायें। देवताओं की स्थापना और पूजा के पहले स्वस्तिकवाचन पूर्वक हाथ में पवित्री, अक्षत, फूल, जल और द्रव्य लेकर एक महासंकल्प कर लेना चाहिये। संकल्प के बाद पूर्वोक्त देवताओं के चित्रपट में अथवा अक्षत-पुज्ज पर उनका आवाहन-स्थापन करके वैदिक-पूजा पद्वति के अनुसार उन सबकी पूजा करनी चाहिये। कथा मण्डप में चारों दिशाओं या कोणों में एक-एक कलश और मध्यभाग में एक कलश- इस प्रकार 5 कलश स्थापित करने चाहिए। चारों ओर के 4 कलशों में से पूर्व के कलश पर ऋग्वेद की, दक्षिण कलश पर यजुर्वेद की, पश्चिम कलश पर सामवेद की और उत्तर कलश पर अथर्ववेद की स्थापना एवं पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद आगे दशावतारों की तथा शुकदेव जी की भी यथास्थान स्थापना करके पूजा करनी चाहिये। कथा-मण्डप में वायुरूपधारी आतिवाहिक शरीरवाले जीव विशेष के लिये एक 7 गांठ के बांस को भी स्थापित कर देना चाहिए। तत्पश्चात वक्ता भगवान का स्मरण करके उस दिन श्रीमद्भागवत महात्म्य की कथा सब श्रोताओं को सुनायें और दूसरे दिन से प्रतिदिन देवपूजा, पुस्तक तथा व्यास की पूजा एवं आरती हो जाने के बाद वक्ता कथा प्रारम्भ करें। सन्ध्या को कथा की समाप्ति होने पर भी नित्यप्रति पुस्तक तथा वक्ता की पूजा तथा आरती, प्रसाद एवं तुलसीदल का वितरण, भगवन्नामकीर्तन एवं शंखध्वनि करनी चाहिए। वक्ता को चाहिए कि प्रतिदिन पाठ प्रारम्भ करने से पूर्व 108 बार ‘ऊॅं नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर-मन्त्र का जप करे। इस प्रकार ध्यान और मन्त्र जप के पश्चात कथा प्रारम्भ करनी चाहिए। सूर्योदय से आरम्भ करके प्रतिदिन साढ़े 3 प्रहर तक कथा कहनी चाहिए। मध्यान्ह में दो घड़ी कथा बंद रखनी चाहिए। प्रातःकाल से मध्यान्ह तक मूल का पाठ होना चाहिए और मध्याह्न से सन्ध्या तक उसका संक्षिप्त भावार्थ अपनी भाषा में कहना चाहिये। मध्यान्ह में विश्राम के समय तथा रात्रि के समय भगवन्नाम-कीर्तन की व्यवस्था होनी चाहिये। 

श्रोताओं के स्थान- वक्ता के सामने श्रोताओं के बैठने के लिये आगे-पीछे 7 पंक्तियां बना लेनी चाहिए। पहली पंक्ति का नाम सत्यलोक है, इसमें साधु-संन्यासी, विरक्त, वैष्णव आदि को बैठाना चाहिए। दूसरी पंक्ति तपलोक कहलाती है, इसमें वानप्रस्थ श्रोताओं को बैठाना चाहिए। तीसरी पंक्ति को जनलोक कहा जाता है, इसमें ब्रह्मचारी श्रोता बैठाये जायें। चौथी पंक्ति महर्लोक कही गयी है, यह ब्राह्मण श्रोताओं का स्थान है। पांचवीं पंक्ति को स्वर्लोक कहते हैं। इसमें क्षत्रिय श्रोताओं को बैठाना चाहिए। छठी पंक्ति का नाम भुवर्लोक है, जो वैश्य श्रोताओं का स्थान है। सातवीं पंक्ति भूर्लोक मानी गयी है, उसमें शूद्रजातीय श्रोताओं को बैठाना चाहिए। स्त्रियां वक्ता के वामभाग की भूमि पर कथा सुनें। ये स्थान उन लोगों के लिये नियत किये गये हैं, जो प्रतिदिन नियमपूर्वक कथा सुनते हैं। जो श्रोता कथा प्रारम्भ होने पर कुछ समय के लिये अनियमितरूप से आते हैं, उनके लिये वक्ता के दक्षिण भाग में स्थान रहना चाहिए। 

श्रोताओं के नियम- श्रोता प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करें। पतित, दुर्जन आदि का संग तो दूर रहा, उनसे वार्तालाप भी न करें। ब्रह्मचर्यपालन, भूमिशयन (नीचे आसन बिछाकर या तख्तपर सोना) सबके लिये अनिवार्य है। एकाग्रचित्त होकर कथा सुननी चाहिए। जितने दिन कथा सुनें-धन, स्त्री, पुत्र, घर एवं लौकिक लाभ की समस्त चिन्ताएं त्याग दें। मलमूत्र पर काबू रखने के लिये हलका आहार सुखद होता है। यदि शक्ति हो तो 7 दिन तक उपवास करके कथा सुनें। अन्यथा दूध पीकर कथा श्रवण करें। इससे भी काम न चले तो फलाहार या एक समय अन्न-भोजन करें। प्रतिदिन कथा समाप्त होने पर ही भोजन करना सही है। दाल, शहद, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित अन्न तथा बासी अन्न का परित्याग करें। काम, क्रोध, मद, मान, ईर्ष्या, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेष से दूर रहें। वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरू, गौ, व्रती, स्त्री, राजा तथा महापुरूषों की कभी भूलकर भी निन्दा न करें। रजस्वला, चाण्डाल, म्लेच्छ, पतित, व्रतहीन, ब्राह्मणद्रोही तथा वेदबहिष्कृत मनुष्यों से वार्तालाप न करें। मन में सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय तथा उदारता को स्थान दें। श्रोताओं को वक्ता से ऊंचे आसन पर कभी नहीं बैठना चाहिए। 

कुछ विशेष बातें- भागवत में 12 स्कन्ध हैं। प्रत्येक स्कन्ध की समाप्ति पर चन्दन, पुष्प, नैवेद्य आदि से पुस्तक की पूजा करके आरती उतारनी चाहिए। शुकदेवजी के आगमन तथा श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रसंग आने पर भी आरती करनी चाहिए। बारहवें स्कन्ध की समाप्ति होने पर पुस्तक और वक्ता का भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए। वक्ता गृहस्थ हों तो, उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार उदारतापूर्वक वस्त्राभूषण तथा नकद भेंट देने चाहिए। मृदंग आदि बजाकर जोर-जोर से कीर्तन करना चाहिए। जय-जयकार, नमस्कार और शंखनाद करने चाहिए। ब्राह्मणों और याचकों को अन्न एवं धन देना चाहिए। वक्ता के हाथों श्रोताओं को प्रसाद एवं तुलसीदल मिलने चाहिए। प्रतिदिन कथा प्रारम्भ और अन्त में आरती होनी आवश्यक है। कथा का विश्राम प्रतिदिन नियत स्थल पर ही करना चाहिए। प्रथम दिन मनु-कर्दम-संवाद तक। दूसर दिन भरत-चरित्र तक। तीसरे दिन सातवें स्कन्ध की समाप्ति। चौथे दिन श्रीकृष्ण के प्राकट्य तक। पांचवें दिन रूक्मिणी-विवाह तक और छठे दिन हंसोपाख्यान तक की कथा बांचकर, सातवें दिन अवशिष्ट भाग को पूर्ण कर देना चाहिए। स्कन्ध आदि और अन्तिम श्लोक को कई बार उच्च स्वर से पढ़ना चाहिए। कथा समाप्ति के दूसरे दिन वहां स्थापित हुये सम्पूर्ण देवताओं का पूजन करके हवन की वेदी पर पच्चभूसंस्कार, अग्निस्थापन एवं कुशकण्डिका करे। फिर विधिपूर्वक वृत ब्राह्मणों द्वारा हवन, तर्पण एव मार्जन कराकर श्रीमद्भागवत की शोभायात्रा निकाले और ब्राह्मण भोजन कराये। मधु मिश्रित खीर और तिल आदि से भागवत के श्लोकों का दशांश (अर्थात 1800) आहुति देनी चाहिए। खीर के अभाव में तिल, चावल, जौ, मेवा, शुद्ध घी और चीनी को मिलाकर हवनीय पदार्थ तैयार कर लेना चाहिए। इसमें सुगन्धित पदार्थ (कपूर-काचरी), नागरमोथ, छड़छड़ीला, अगर-तगर, चन्दनचूर्ण आदि) भी मिलाने चाहिए। पूर्वोक्त 1800 आहुति गायत्री-मन्त्र अथवा दशमस्कन्ध के प्रति श्लोक से देनी चाहिए। हवन के अन्त में दक्पाल आदि के लिये बलि, क्षेत्रपाल-पूजन, छायापात्र-दान, हवन का दशांश तर्पण एवं तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिए। फिर आरती के बाद किसी नदी, सरोवर या तालाब आदि पर जाकर अवभृथ स्नान (यज्ञान्त-स्नान) भी करना चाहिए। अन्त में कम से कम 12 ब्राह्मणों को मधुयुक्त खीर का भोजन कराना चाहिए। व्रत की पूर्ति के लिये स्वर्ण दान और गोदान करना चाहिए। सुवर्ण-सिंहासन पर विराजित सुन्दर अक्षरों में लिखित श्रीमद्भागवत की पूजा करके उसे दक्षिणासहित कथावाचक आचार्य को दान कर देना चाहिए। अन्त में सब प्रकार की त्रुटियों की पूर्ति के लिये विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ कथावाचक आचार्य के द्वारा सुनना चाहिए। विरक्त श्रोताओं को गीता सुननी चाहिए। 

प्रारम्भ में संग्रहणीय सामग्री सूची (पूजन सामग्री)- गंगाजल, रोली (कुमकुम), मोली (रक्षासूत्र), चन्दन, शुद्ध केसर, कपूर, पुष्प, पुष्पमाला, तुलसीदल, बिल्वपत्र, दूर्वादल, धूप, शुद्ध अगरबत्ती, पच्चामृत(दूध, दही, मधु, चीनी, घी), दीप (यथासम्भव शुद्ध, गोघृत और रूई), पान का पत्ता 50, सुपारी 25, यज्ञोपवीत 25, लइायची, लौंग, पेड़ा, मेवा, गुड़, चावल, गेहूं, कुण्डे मिट्टी के 2 गेहूं बोने के लिये, पीली सरसों, अबीर, गुलाल, ऋतुफल, कपड़ा सफेद 5 गज, कपड़ा लाल 5 गज, कपड़ा पीला 5 गज, कपड़ा शुद्ध रेशमी एक गज, सर्वतोभद्र की रचना के लिये हरा, लाल, काला, पीला और गुलाबी रंग, गोबर, नारियल 2 या 7, शुद्ध इत्र, कुशा, सिन्दूर, रूप्ये-रेजगी-पैसे, आरती का पात्र, धण्टा, घड़ियाल, शंख-झांझ आदि, कोसा 50, दियासलाई, चौकी एक सर्वतोभद्र के लिये, चौकी एक नारदजी के लिये, चौकी एक नवग्रह, षोडशमातृका और गणेश के लिये, चौकी एक व्यास, शुकदेव, सप्तचिरजीवी तथा पौराणिकों के लिये, पाटा एक शेष-सनत्कुमार आदि के लिये। 

कलश स्थापना की सामग्री- तांबे का एक कलश, कांसी या तांबे का पात्र एक, कलश मिट्टी के 5, सप्तधान (जौ, गेहूं, धान, तिल, कंगनी, सांवा, चीना), पच्चपल्लव (आम, पीपल, पाकर, गूलर और बड़ के पत्ते), दूर्वा, कुशा, सुपारी, सुवर्ण की टिकड़ी 4, पच्चरत्न ( हीरा, नीलम, लाल, मोती और सोना, अभाव में यथासाध्य सुवर्ण), चन्दन, अक्षत, फूल, तीर्थोदक, समुद्रजल, सप्तमृत्तिका (घुड़साल की, हाथीशाला की, दीमक की, नदी-संगम की, राजद्वार की, गोशाला की, तालाब की), सर्वौषधि ( कूट, जटामाशी, हल्दी गांठ 2, राभट, मुरा, शैलेभ, चन्दन, बचा, चम्पक और नागरमोथा- अभाव में केवल हल्दी), नदी संगम का जल, श्रीलक्ष्मी नारायण की स्वर्णमयी प्रतिमा (चार तोले सोने की अथवा अपनी शक्ति के अनुसार)।

कथा मण्डप के लिये सामग्री- चंदोवे का कपड़ा, चौकोर मण्डप, केले के खम्भे 4, बांस के खम्भे, मण्डप को चारों ओर से माला, फूल और पत्तों से सजाना, चारों दिशाओं में झंडी लगाना, वस्त्र और गोटे आदिसे सजाना, चौकी व्यास के लिये, गद्दी, मसनद, तकिये, कम्बल, चद्दर, पांच झंडियां, पुस्तक का वेष्टन, पुस्तक के लिये चौकी, आम के पत्तों के बंदनवार। गणेशजी, देवता, श्रीमद्भागवत और आचार्य की पूजा के लिये प्रतिदिन चन्दन, पुष्प, पुष्पमाला, धूप, दीप आदि सामग्री। 
वरण की सामग्री- वक्ता के लिये चादर, धोती, गमछा, आसन, दक्षिणा, रूद्राक्षमाला, तुलसीमाला, जलपात्र आदि, जप करने वालों के लिये भी यथासम्भव वस्त्र-द्रव्य अदि।
पाठ के लिये पुस्तक- भागवत, रामायण, गीता, सहस्त्रनाम आदि।

हवन के लिये सामग्री- वेदी के लिये स्वच्छ बालू एक बोरा, सूखी आम की लकड़ी दो मन, कुशकण्डिका के लिये कुशा, दुर्वा, अग्नि लाने के लिये दो कांस्यपात्र, एक पूर्णपात्र पीतल का बड़ा सा, यज्ञपात्र-प्रणीता, प्रोक्षणी, स्त्रुवा, स्त्रुवा, स्त्रुक्, पूर्णाहुतिपात्र, चरूस्थाली, आज्यस्थाली (कांसा का बड़ा सा कटोरा), हवन के लिये पदार्थ- मधुमिश्रित खरी, छायापात्र-दान के लिये कांसे की छोटी एक कटोरी तथा उसके लिये घी। तिल 10 सेर, चावल 5 सेर, जौ 2 सेर, शुद्ध घी 4 सेर, शुद्ध चीनी 2 सेर, पच्चमेवा 2 सेर (पिश्ता, बादाम, किशमिश, अखरोट और काजू)- इन सबको मिलाकर हवनसामग्री बनायी जाती है। फिर इसमें सुगन्धित द्रव्य (कपूरकाचरी, छड़छड़ीला, नागरमोथा, अगर-तगर, चन्दनचूर्ण आदि) आवश्यकतानुसार मिला लें। बलि के लिये पापड़, उड़द, दही, चावल, रूई की बत्ती, दक्षिणा, क्षेत्रपाल-बलि के लिये हंड़िया, काजल, सिंदूर, दीपक, दक्षिणा आदि। पूर्णाहुति के लिये नारियल का गोला आदि, वितरण के लिये प्रसाद। ब्राह्मण-भोजन के लिये मधुमिश्रित खीर तथा अन्यान्य मधुर पकवान, पूरी-साग आदि। हवनकर्ता ब्राह्मणों के लिये वरण और दक्षिणा आदि। कथा समाप्त होने पर कथावाचक को भेंट देने के लिये वस्त्र, आभूषण, दक्षिणा आदि।